सारनाथ का प्राचीन बौद्ध स्थल यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल

दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित विश्व विरासत समिति के 48वें सत्र में वर्ष 2025-26 चक्र के लिए भारत के आधिकारिक नामांकन “प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ” (Ancient Buddhist Site of Sarnath) को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है। इसके साथ ही सारनाथ इस प्रतिष्ठित मान्यता को प्राप्त करने वाली भारत की 45वीं संपत्ति बन गई है।

सारनाथ को विश्व धरोहर स्थल घोषित किए जाने के बाद, चार सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थलों में से तीन—लुंबिनी (नेपाल), महाबोधि मंदिर, बोधगया (बिहार) और अब सारनाथ (उत्तर प्रदेश)—विश्व धरोहर सूची में शामिल हो गए हैं। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल भी विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं, जैसे सांची, नालंदा और अजंता (तीनों भारत में), अनुराधापुर (श्रीलंका), पहाड़पुर (बांग्लादेश), तक्षशिला और तख्त-ए-बाही (दोनों वर्तमान पाकिस्तान में) आदि।

प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ के बारे में

यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत सूची में शामिल इस क्रमिक संपत्ति में दो घटक भाग शामिल हैं—चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष, जिनमें धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार, अशोक स्तंभ आदि शामिल हैं। ये सभी उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित हैं। ये दोनों घटक मिलकर प्राचीन सारनाथ स्थल के स्थापत्य और पुरातात्विक अवशेषों को संरक्षित करते हैं। 

बौद्ध परंपरा में इस स्थल को विभिन्न नामों—ऋषिपत्तन, इशिपत्तन और मृगदाव—से जाना जाता है। ये सभी नाम उस पवित्र भौगोलिक क्षेत्र को संदर्भित करते हैं, जहां बुद्ध ने ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी में आकर अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” अर्थात “धर्म के चक्र का प्रवर्तन” कहा जाता है।

इस घटना ने बौद्ध संघ की शुरुआत और आर्य अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांतों की स्थापना को चिह्नित किया।

बुद्ध ने स्वयं सारनाथ को बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक के रूप में बताया था। इसके बाद राजकीय, मठवासी और जनसामान्य के संरक्षण एवं सहयोग से सारनाथ का कई शताब्दियों में विकास हुआ। गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश के स्थान और उनके प्रथम शिष्यों से मिलने के स्थान के आसपास अनेक स्तूपों, मंदिरों और विहारों का निर्माण किया गया।

इस स्थल में पूर्व-मौर्य काल (ईसा पूर्व 5वीं-4वीं शताब्दी से ईसा पूर्व 3वीं शताब्दी) से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी में सारनाथ के विनाश तक निर्मित प्राचीन स्मारकों का समूह शामिल है। इसमें बाद के काल में किए गए कुछ निर्माण और परिवर्धन भी शामिल हैं।

सारनाथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सबसे व्यापक रूप से उत्खनित स्थलों में से एक रहा है। इन उत्खननों के परिणामस्वरूप लगभग 16 शताब्दियों में विकसित एक क्रमिक पुरातात्विक बस्ती का पता चला है, जिसका कालक्रम ईसा पूर्व 5वीं-4वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक फैला हुआ है।

Source: PIB

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