असम के जोरहाट में दुनिया की पहली गिब्बन रेलवे कैनोपी क्रॉसिंग दर्ज की गई

हाल ही में, असम के जोरहाट जिले में स्थित होलोंगापार गिब्बन अभयारण्य (Hollongapar Gibbon Sanctuary)  में एक नर वेस्टर्न हुलॉक गिब्बन ने, कथित तौर पर अभयारण्य से होकर गुज़रने वाली रेल लाइन के ऊपर बने एक कैनोपी पुल को पार किया है।   

ऐतिहासिक घटना: रेलवे लाइन पर कैनोपी ब्रिज का उपयोग

  • विश्व में पहला मामला: ‘भारतीय वन्यजीव संस्थान’ (WII) के अनुसार, यह दुनिया का पहला ऐसा डॉक्युमेंटेड मामला है जहाँ किसी गिब्बन ने रेलवे लाइन के ऊपर बनाए गए कृत्रिम कैनोपी ब्रिज (Canopy Bridge) को पार किया है।
  • कैनोपी ब्रिज क्या हैं?: ये पेड़ों के ऊपरी हिस्सों (Tree Tops) को जोड़ने वाले ऊंचे पुल होते हैं। ये पेड़ों पर रहने वाले (Arboreal) जीवों को जमीन पर उतरे बिना, खंडित हो चुके जंगलों के बीच सुरक्षित रूप से आवाजाही करने में मदद करते हैं।
  • पृष्ठभूमि: अभयारण्य के बीच से गुजरने वाली ‘लुमडिंग-डिब्रूगढ़ सिंगल-ट्रैक रेलवे लाइन’ के विद्युतीकरण कार्य के प्रभाव को कम करने के लिए इसी साल फरवरी और मार्च में इन विशेष पुलों को स्थापित किया गया था। 

वेस्टर्न हूलॉक गिब्बन (Western Hoolock Gibbon) के बारे में मुख्य तथ्य

  • भारत का एकमात्र कपि (वानर): यह भारत में पाई जाने वाली इकलौती कपि (Ape) प्रजाति है। यह ‘हाइलोबाटिडे’ (Hylobatidae) कुल से संबंधित है, जिसमें छोटे कपि या गिब्बन शामिल होते हैं।
  • पूर्णतः वृक्षवासी (Strictly Arboreal): ये जीव अपना पूरा जीवन पेड़ों पर ही बिताते हैं। आवाजाही और जीवित रहने के लिए ये पूरी तरह से घने और निरंतर फैले हुए वन छत्र (Continuous Forest Canopy) पर निर्भर करते हैं।

संरक्षण स्थिति 

  • IUCN रेड लिस्ट: एंडेंजर्ड  
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I (Schedule I) — यह भारत में किसी भी जीव को मिलने वाला सर्वोच्च कानूनी संरक्षण स्तर है।

भौगोलिक वितरण

यह प्रजाति केवल पूर्वोत्तर  भारत के जंगलों (मुख्य रूप से असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड) में पाई जाती है। इसके अलावा बांग्लादेश और म्यांमार में भी इनकी छोटी आबादी मौजूद है। इनका पर्यावास स्थान बहुत अधिक खंडित (Fragmented) है, जिसके कारण इनका संरक्षण करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। 

इस सफलता का महत्व

चूंकि हूलॉक गिब्बन जमीन पर नहीं चलते, इसलिए रेलवे लाइन या सड़कों के कारण जंगल कटने से वे अपने ही परिवार और आहार से अलग हो जाते हैं। इस कैनोपी ब्रिज की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सही तकनीकों का उपयोग करके वन्यजीवों के प्राकृतिक पर्यावास की रक्षा की जा सकती है।

error: Content is protected !!