भारत ने 112 को अपना यूनिवर्सल इमरजेंसी नंबर क्यों अपनाया?

देश में आपातकालीन सेवाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को सख्त हिदायत दी है कि वे अगले तीन महीनों के भीतर अपने सभी पुराने इमरजेंसी नंबरों को ‘112’ राष्ट्रीय आपातकालीन हेल्पलाइन (NERS) के साथ पूरी तरह से इंटीग्रेट करें।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में अमेरिका के ‘911’ की तर्ज पर भारत में ‘112’ हेल्पलाइन की शुरुआत की थी। उद्देश्य था कि देश के नागरिकों को अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग नंबर न घुमाने पड़ें। लेकिन सात साल बाद भी इस  पर सही से कार्यान्वयन नहीं हो  है।

सिर्फ 5 राज्यों में ही ‘वन नेशन, वन हेल्पलाइन’

एक मीडिया रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए डाक्यूमेंट्स  के हवाले से बताया गया है कि अब तक देश के केवल पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही इस एकीकरण को शत-प्रतिशत पूरा किया है। इनमें शामिल हैं: दिल्ली, केरल, गुजरात, हरियाणा और लक्षद्वीप। 

बाकी राज्यों में आज भी पुलिस के लिए 100, फायर के लिए 101, और एम्बुलेंस के लिए 102 या 108 जैसे अलग-अलग नंबरों का ही बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है, जिससे तकनीकी समन्वय में देरी होती है।

क्यों चुना गया ‘112’ नंबर?  

‘112’ केवल भारत का नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ (EU) समेत दुनिया के कई देशों का साझा इमरजेंसी नंबर है। 1976 में ‘यूरोपीय कॉन्फ्रेंस ऑफ पोस्टल एंड टेलीकम्युनिकेशंस एडमिनिस्ट्रेशन’ (CEPT) ने इसे दो मुख्य व्यावहारिक कारणों से चुना था:

  1. रोटरी डायल का जमाना: उस वक्त उंगली फंसाकर घुमाने वाले (रोटरी) फोन होते थे। ‘1’ और ‘2’ को डायल करने में सबसे कम समय लगता था।
  2. लॉक्ड फोन से भी डायल संभव: पुरानी तकनीकों में नंबर ‘3’ डायल करने पर फोन पूरी तरह लॉक हो जाता था, लेकिन ‘112’ को लॉक फोन से भी मिलाया जा सकता था।
  3. गलती से डायल होने से बचाव: सीईपीटी ने जानबूझकर 111 या 999 जैसे एक जैसे अंकों को नहीं चुना, ताकि जेब में रखे फोन से या बच्चों से गलती से आपातकालीन कॉल न लग जाए। आज के टचस्क्रीन वाले स्मार्टफोन में भी 112 टाइप करना बेहद आसान माना जाता है।

निर्भया कांड के बाद रखी गई थी नींव

भारत में इस एकीकृत सिस्टम (ERSS) को लाने का फैसला साल 2012 के दिल्ली बस सामूहिक बलात्कार मामले (निर्भया कांड) के बाद गठित की गई जस्टिस जे. एस. वर्मा कमेटी की सिफारिशों के आधार पर किया गया था। कमेटी ने एक ऐसी सार्वजनिक आपातकालीन प्रणाली की मांग की थी जो कॉल आते ही तुरंत रिस्पांस टीम को मौके पर भेज सके।

इसके बाद दूरसंचार विभाग (DoT) ने ‘112’ नंबर आवंटित किया और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 19 फरवरी 2019 को निर्भया फंड के जरिए इसे देशव्यापी स्तर पर लॉन्च किया।

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