भूल जाने का अधिकार (Right to be Forgotten)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह माना है कि “भूल जाने का अधिकार” (right to be forgotten) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार (राइट तो प्राइवेसी) से निकलता है। यह व्यक्तियों को पब्लिक डिजिटल एक्सेस यानी सर्च इंजन से अपनी व्यक्तिगत जानकारी हटाने की मांग करने में सक्षम बनाता है, जब वह जानकारी किसी वैध सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी कानून गूगल या अन्य सर्च इंजन को उन मामलों के अदालती रिकॉर्ड दिखाने की अनुमति नहीं देता है, जिनमें बरी या डिस्चार्ज कर दिया गया हो, केस रद्द हो गया हो या समझौता हो गया हो, या  निजी प्रकृति के हो।

डी-इंडेक्सिंग की प्रक्रिया:

  • डी-इंडेक्सिंग का अर्थ अदालती फैसले को पब्लिक रिकॉर्ड से हटाना या मिटाना नहीं है।
  • यह केवल किसी व्यक्ति के नाम को सर्च रिजल्ट में आने से रोकता है, जिससे नाम-आधारित इंटरनेट सर्च के माध्यम से फैसले को खोजना कठिन हो जाता है, जबकि केस के विवरण या साइटेशन (citations) के माध्यम से यह अभी भी सुलभ रहता है।

न्यायालय के निर्देश:

  • न्यायालय ने इस आदेश का दो सप्ताह के भीतर अनुपालन करने का निर्देश दिया है।
  • इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने ‘इंडियन कानून’ (एक कानूनी डेटाबेस प्लेटफॉर्म) को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं के रिकॉर्ड के संबंध में अपने प्लेटफॉर्म पर नाम-आधारित सर्च को प्रतिबंधित करे।
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