कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना) को मंज़ूरी दी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 जुलाई को ‘समुद्र मंथन’ — राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना (Samudra Manthan : National Offshore Exploration Scheme) को मंजूरी दी। यह पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्रक योजना है, जिसके लिए 84,084 करोड़ रुपये का परिव्यय स्वीकृत किया गया है। इसका कार्यान्वयन वित्त वर्ष 2030-31 तक किया जाएगा।

यह योजना प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस 2025 पर लाल किले से व्यक्त उस दृष्टिकोण को साकार करती है, जिसमें भारत की विशाल अपतटीय ऊर्जा क्षमता को उजागर करने के लिए आधुनिक समय के ‘समुद्र मंथन’ का आह्वान किया गया था।

यह योजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने, घरेलू तेल एवं गैस अन्वेषण तथा उत्पादन में तेजी लाने, तकनीकी नेतृत्व को बढ़ावा देने और विकसित भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

योजना के प्रमुख घटक

‘समुद्र मंथन’ में अपतटीय अन्वेषण की पूरी मूल्य श्रृंखला को शामिल करते हुए कई उपाय किए गए हैं। इनमें शामिल हैं:

  • उच्च गुणवत्ता वाले भूकंपीय आंकड़ों का बड़े पैमाने पर संग्रह, प्रसंस्करण और विश्लेषण
  • गहरे समुद्र और अति-गहरे समुद्र क्षेत्रों में खोजी ड्रिलिंग में तेजी लाना।
  • नए और सीमांत तलछटी बेसिनों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग
  • साझा अपतटीय उत्पादन एवं निकासी बुनियादी ढांचे का विकास।
  • एकीकृत तेल एवं गैस विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र की स्थापना।
  • डिजिटल कार्यक्रम प्रबंधन के लिए विशेष व्यवस्था।
  • क्षमता निर्माण और नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने को बढ़ावा देना।
  • हितधारकों की भागीदारी तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना।

इन सभी उपायों के माध्यम से देश में अपतटीय अन्वेषण और उत्पादन को गति देने के लिए एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जाएगा।

अपेक्षित लाभ

‘समुद्र मंथन’ योजना से:

  • 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल समतुल्य नए भंडार जुड़ने की संभावना है।
  • देश में अपतटीय अन्वेषण गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
  • घरेलू कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
  • बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
  • मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी विनिर्माण को मजबूती मिलेगी।
  • अपतटीय प्रौद्योगिकी और सेवाओं के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा।

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