कोमागाटा मारू घटना

हाल ही में ‘द टुनाइट शो विद जिमी फॉलन’ में अपनी उपस्थिति के दौरान, पॉपस्टार दिलजीत दोसांझ ने 1914 की कोमागाटा मारू घटना के बारे में चर्चा की। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और प्रवासी भारतीयों के इतिहास की एक अत्यंत दुखद और महत्वपूर्ण घटना है। 

कोमागाटा मारू घटना (1914)

कोमागाटा मारू, जिसे ‘गुरु नानक जहाज’ भी कहा जाता है, एक जापानी स्टीमशिप था जिसे बाबा गुरदित सिंह ने हांगकांग में चार्टर (किराए पर) लिया था।

यात्रियों का विवरण:

  • कुल यात्री: 376 भारतीय (340 सिख, 24 मुस्लिम और 12 हिंदू)।
  • पृष्ठभूमि: इनमें से अधिकांश किसान, पूर्व सैनिक और मजदूर थे।
  • उद्देश्य: ये लोग कनाडा में बेहतर मजदूरी और अपने परिवारों के लिए अच्छे भविष्य की तलाश में पश्चिमी पहनावे में वहां पहुंचे थे। 

कनाडा में संघर्ष और नस्लीय भेदभाव

जहाज 4 अप्रैल को हांगकांग से रवाना हुआ और 23 मई को वैंकूवर के बरार्ड इनलेट (Burrard Inlet) पहुँचा।

  • प्रवेश निषेध: नस्लवादी आव्रजन नियमों (जैसे ‘कंटीन्यूअस जर्नी रेगुलेशन’) के कारण केवल 24 यात्रियों को ही उतरने की अनुमति दी गई।
  • अमानवीय स्थिति: कनाडाई अधिकारियों ने जहाज की घेराबंदी कर दी और यात्रियों को भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता तक देने से मना कर दिया।
  • प्रतिरोध: 19 जुलाई को जब पुलिस और आव्रजन अधिकारियों ने जहाज पर नियंत्रण करने की कोशिश की, तो यात्रियों ने लोहे के पाइपों और कोयले से उनका मुकाबला किया।
  • तटीय समिति (Shore Committee): स्थानीय दक्षिण एशियाई समुदाय ने हुसैन रहीम के नेतृत्व में एक ‘तटीय समिति’ बनाई। उन्होंने जहाज के चार्टर को बनाए रखने और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए $20,000 जुटाए। 

भारत वापसी और बजबज (Budge Budge) नरसंहार

कानूनी लड़ाई हारने के बाद, जहाज को भारत वापस भेज दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के कारण इसे हांगकांग और सिंगापुर जैसे बंदरगाहों पर भी रुकने नहीं दिया गया।

  • बजबज घाट: जब जहाज हुगली नदी के तट पर स्थित बजबज (कोलकाता) पहुँचा, तो ब्रिटिश अधिकारियों ने यात्रियों को जबरन एक विशेष ट्रेन से पंजाब भेजने की कोशिश की।
  • गोलीबारी: यात्रियों ने ट्रेन में बैठने से इनकार कर दिया और कोलकाता की ओर मार्च करना शुरू कर दिया। ब्रिटिश सैनिकों ने उन पर गोलियां चला दीं, जिसमें 20 यात्री मारे गए और कई घायल हुए।
  • बाबा गुरदित सिंह: वे वहां से बच निकले लेकिन बाद में महात्मा गांधी के सुझाव पर उन्होंने एक देशभक्त के रूप में आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें पांच साल की जेल हुई। 

ऐतिहासिक महत्व

यह घटना कनाडा के इतिहास में नस्लीय भेदभाव के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। 2016 में, कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इस घटना के लिए हाउस ऑफ कॉमन्स में औपचारिक रूप से माफी मांगी थी।

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