‘ट्रॉमा केयर’ ‘जीवन के अधिकार’ का अभिन्न अंग-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें ‘ट्रॉमा केयर’ (घायल लोगों के लिए चिकित्सा देखभाल) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ का एक अभिन्न अंग माना गया है।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रपुरकर की पीठ ने नागरिकों के लिए आपातकालीन चिकित्सा तक त्वरित पहुंच सुनिश्चित करने हेतु सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
प्रमुख निर्देश (3 महीने के भीतर कार्यान्वयन अनिवार्य)
- एकल हेल्पलाइन नंबर (112): सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए ‘112’ नंबर को पूर्णतः सक्रिय (operationalise) करना होगा।
- गुड सेमेरिटन (Good Samaritan) शिकायत निवारण प्रणाली: राज्यों को भौतिक (physical) और डिजिटल दोनों स्तरों पर एक कार्यात्मक शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करनी होगी। इसके लिए जिला और राज्य स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति अनिवार्य है।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- समय का महत्व: अदालत ने जोर देकर कहा कि आपातकालीन स्थिति में “बिना चिकित्सा देखभाल के बिताया गया हर मिनट जीवित रहने की संभावना को काफी कम कर देता है।” न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि “तत्परता (swiftness), शाब्दिक रूप से, दवा की तरह है।”
- कार्यान्वयन की स्थिति: अदालत ने माना कि केंद्र सरकार ने पहले ही कई योजनाएं (जैसे PM RAHAT कैशलेस उपचार योजना, गुड समेरिटन रूल्स, नेशनल एम्बुलेंस कोड और ERSS-112 फ्रेमवर्क) शुरू की हैं, लेकिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इनका क्रियान्वयन “अल्प और खंडित” (scanty and fragmented) है।


