साँची स्तूप के पवित्र अवशेष मंगोलिया भेजे जा रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक विशेष पहल के तहत, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल साँची स्तूप से भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रमुख शिष्यों—सारिपुत्र और मौद्गल्यायन—के पवित्र अवशेषों को मंगोलिया भेजा जा रहा है।

साँची स्तूप का ऐतिहासिक महत्व:

  • प्राचीनता: साँची में स्थित बौद्ध स्मारकों (स्तंभों, मंदिरों और मठों) का समूह दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है। यह दुनिया का सबसे पुराना जीवित बौद्ध अभयारण्य है, जो 12वीं शताब्दी ईस्वी तक भारत का एक प्रमुख बौद्ध केंद्र रहा।
  • सेतियागिरी (Cetiyagiri): विदिशा से लगभग 10 किमी दूर स्थित ये स्मारक श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथों में ‘सेतियागिरी’ के रूप में पवित्र माने गए हैं। कहा जाता है कि सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपनी यात्रा शुरू करने से पहले यहाँ विश्राम किया था।
  • स्थापना: साँची को एक पवित्र केंद्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय मौर्य सम्राट अशोक को जाता है। उन्होंने यहाँ एक विशाल ‘अशोक स्तंभ’ स्थापित कर इसे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल बनाया।

स्तूप का विकास और वास्तुकला:

  • शुंग काल (184-72 ईसा पूर्व): सम्राट अशोक के समय बने मूल ईंट के स्तूप को शुंग काल में और बड़ा किया गया। इसमें पत्थर की कोटिंग की गई और चारों ओर परिक्रमा पथ व सीढ़ियाँ बनाई गईं।
  • सातवाहन काल (1ली शताब्दी ईस्वी): इस दौरान स्तूप को चार अलंकृत ‘तोरण’ (प्रवेश द्वार), हर्मिका, यष्टि और छत्र के साथ और अधिक भव्य बनाया गया।
  • गुप्त काल (5वीं शताब्दी ईस्वी): स्तूप में अंतिम बड़ा बदलाव गुप्त काल में हुआ, जब प्रवेश के चारों मुख्य बिंदुओं पर चार और मंदिर (shrines) जोड़े गए।
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