संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पारित होने में विफल रहा

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, जिसका उद्देश्य लोकसभा की सीटों का विस्तार करना और महिला आरक्षण को तत्काल प्रभावी बनाना था, 17 अप्रैल, 2026 को लोकसभा में पारित होने में विफल रहा। यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त नहीं कर सका (पक्ष में 298, विरोध में 230 मत)। 

विधेयक के मुख्य उद्देश्य:

  • लोकसभा का विस्तार: लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करना (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 सदस्य)।
  • महिला आरक्षण का कार्यान्वयन: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संशोधन अधिनियम, 2023) के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) आरक्षण को लागू करना।
  • तत्काल परिसीमन: 2023 के अधिनियम के अनुसार, आरक्षण जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही प्रभावी होना था। 131वें संशोधन विधेयक का लक्ष्य नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार पर इस प्रक्रिया को तुरंत शुरू करना था। 

तीन प्रमुख विधेयक:

सरकार इस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए तीन विधेयक लेकर आई थी:

  1. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: सीटों की संख्या बढ़ाने और आरक्षण प्रावधानों के लिए।
  2. परिसीमन (Delimitation) विधेयक, 2026: क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए परिसीमन आयोग का गठन करना।
  3. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: केंद्र शासित प्रदेशों में इन परिवर्तनों को लागू करना। 

संविधान संशोधन प्रक्रिया (अनुच्छेद 368):

भारतीय संविधान के भाग XX का अनुच्छेद 368 संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति देता है। इसके मुख्य नियम निम्नलिखित हैं:

  • विशेष बहुमत (Special Majority): संशोधन विधेयक को सदन की कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से पारित होना अनिवार्य है।
  • सदन की भूमिका: विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है, लेकिन राज्य विधानसभाओं में नहीं।
  • राज्यों का अनुसमर्थन: यदि संशोधन संघीय ढांचे (राष्ट्रपति का चुनाव, सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट की शक्तियाँ, संघ (केंद्र) सरकार की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार (73), राज्य की कार्यपालिका शक्ति (अनुच्छेद 162), सातवीं अनुसूची में दी गई कोई भी सूची, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, या स्वयं अनुच्छेद 368) को प्रभावित करता है, तो इसे कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रपति की सहमति: विशेष बहुमत से पारित होने के बाद, राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य हैं।

मूल संरचना:1973 के केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि संसद संविधान के “बुनियादी ढांचे” (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा) को नहीं बदल सकती।

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