संसदीय समिति ने भारत के लिए ‘पोलर एंबेसडर’ नियुक्त करने और आर्कटिक काउंसिल का पूर्ण सदस्य बनने की सिफारिश की

विदेश मामलों से संबंधित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि भारत को ‘ध्रुवीय क्षेत्र के लिए राजदूत’ (Polar Ambassador) नियुक्त करना चाहिए। समिति ने सरकार से आर्कटिक परिषद की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने के प्रयास करने का भी आग्रह किया है, ताकि भारत उसकी गतिविधियों में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सके।

समिति ने कहा कि इस प्रकार का पद सृजित करने से न केवल भारत की विदेश नीति में ध्रुवीय क्षेत्रों के महत्व को प्रदर्शित करने में मदद मिलेगी, बल्कि ध्रुवीय क्षेत्रों से संबंधित भारत की नीतिगत स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने और ध्रुवीय कूटनीति को आगे बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी।

वर्तमान में भारत आर्कटिक परिषद के 13 पर्यवेक्षक देशों में शामिल है। आर्कटिक परिषद में उन 8 देशों की पूर्ण सदस्यता है, जिनका भू-भाग आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है।

पर्यवेक्षक देशों के पास निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता। वे सीधे आर्कटिक क्षेत्र में वित्तीय योगदान या अनुसंधान गतिविधियां भी संचालित नहीं कर सकते।

रूस की भूमिका

यूक्रेन संघर्ष के बाद आर्कटिक क्षेत्र में रूस की कई वैज्ञानिक अनुसंधान गतिविधियां रुक गई हैं। इस संबंध में समिति ने सिफारिश की कि भारत को अपने राजनयिक माध्यमों से परिषद के अन्य सात सदस्य देशों के समक्ष यह मुद्दा उठाना चाहिए कि क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए रूस की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है

समिति ने विशेष रूप से सुझाव दिया कि भारत को रूसी आर्कटिक अनुसंधान केंद्रों तक पहुंच प्राप्त करने की संभावना तलाशनी चाहिए।

आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन को देखते हुए वैज्ञानिक सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वहां होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तन का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ सकता है।

ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका

समिति ने सरकार को वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधि के रूप में भारत की भूमिका को और मजबूत करने के लिए उपयुक्त रणनीति अपनाने की सिफारिश की है।

इसके अलावा, आर्कटिक परिषद में शामिल एशियाई पर्यवेक्षक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। इसके लिए जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और भारत के बीच चतुष्पक्षीय समझौते की संभावना तलाशने की सिफारिश की गई है।

आर्कटिक नीति का विस्तार

समिति ने भारत की आर्कटिक नीति को केवल वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रित रखने के बजाय उसमें भूराजनीति, रणनीतिक हित और कूटनीति को भी शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

समिति ने यह भी कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में खनिज संसाधनों का दोहन भविष्य की कूटनीतिक बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहिए। इनमें औषधीय सक्रिय घटकों के निर्माण, वातानुकूलन उपकरणों और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं।

इस प्रकार, समिति के अनुसार भारत के लिए आर्कटिक नीति को विज्ञान से आगे बढ़ाकर रणनीतिक, आर्थिक, संसाधन एवं कूटनीतिक दृष्टिकोण से विकसित करना आवश्यक है।

आर्कटिक काउंसिल के बारे में

आर्कटिक काउंसिल एक प्रमुख अंतर-सरकारी मंच है जो आर्कटिक से जुड़े आम मुद्दों पर आर्कटिक देशों, आर्कटिक के मूल निवासियों और आर्कटिक क्षेत्र में रहने वाले अन्य लोगों के बीच सहयोग, समन्वय और बातचीत को बढ़ावा देता है।

इसे औपचारिक रूप से 1996 में स्थापित किया गया था। आर्कटिक काउंसिल के सभी फैसलों और कथनों के लिए आठों आर्कटिक देशों की सहमति जरूरी होती है।

ओटावा घोषणापत्र इन देशों को आर्कटिक काउंसिल का सदस्य बताता है। इन आठ देशों का इलाका आर्कटिक क्षेत्र में आता है, इसलिए वे इस क्षेत्र के संरक्षक की भूमिका निभाते हैं।

ये आठ देश हैं: कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन, रूसी संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका।

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