भारत का पहला सैटेलाइट-टैग्ड गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ काजीरंगा में छोड़ा गया

भारत के पहले सैटेलाइट-टैग्ड (उपग्रह-चिह्नित) गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए को 15 मई, 2026 को असम के 1,302 वर्ग किलोमीटर में फैले काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया। यह एक लुप्तप्राय (endangered) प्रजाति है। कछुए को छोड़े जाने का यह कार्यक्रम लुप्तप्राय प्रजाति दिवस (Endangered Species Day) के अवसर के साथ मेल खाता है। लुप्तप्राय प्रजाति दिवस हर साल मई के तीसरे शुक्रवार को मनाया जाता है। यह पहल असम के व्यापक संरक्षण प्रयासों को दर्शाती है, जिसमें हाल ही में कोहोरा में काजीरंगा ऑर्किड पार्क का उद्घाटन भी शामिल है।

प्रजाति की विशेषताएं और महत्व

  • विस्तृत पर्यावास स्थान: यह प्रजाति भारत में व्यापक रूप से पाई जाती है और बड़ी नदियों, झीलों तथा जलाशयों में निवास करती है।
  • संरक्षण की स्थिति: अपने व्यापक वितरण के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट (लाल सूची) में इस प्रजाति को लुप्तप्राय (एंडेंजर्ड) माना गया है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र में भूमिका: लंबे समय तक जीवित रहने वाले और बड़े आकार में बढ़ने वाले ये जीव नदियों के प्रमुख शिकारी हैं। ये मृत और सड़ते हुए जीवों के अवशेषों को खाकर नदी प्रणाली को साफ रखने में मदद करते हैं।
  • पहचान: गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए (निलसोनिया गैंगेटिका) को उसके सिर के ऊपरी हिस्से पर बने तीर के आकार (arrowhead) के विशिष्ट निशानों से पहचाना जा सकता है।

कछुआ संरक्षण में असम और काजीरंगा की भूमिका

असम अपनी अद्भुत विविधता के कारण मीठे पानी के कछुओं के संरक्षण के लिए दुनिया के शीर्ष प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शुमार है। यह राज्य कछुओं की 21 प्रजातियों का आश्रय है, जो इसे एशिया में कछुओं के सबसे समृद्ध पर्यावासों में से एक बनाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में पाई जाने वाली सॉफ्टशेल (नरम पीठ वाले) कछुओं की आठ प्रजातियों में से पांच अकेले काजीरंगा में पाई जाती हैं।कानूनी संरक्षण: भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ (Nilssonia gangetica), या गंगा सॉफ्टशेल कछुआ, दक्षिण एशिया की गंगा, सिंधु और महानदी जैसी नदियों में पाया जाता है। यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूची (Schedule) के तहत सूचीबद्ध है।

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