विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD) और भारत की चिंताएं
विकास के लिए निवेश सुविधा (Investment Facilitation for Development – IFD) चीन के नेतृत्व में विश्व व्यापार संगठन (WTO) में किया गया एक समझौता है। इसकी 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक मध्य अफ्रीकी देश कैमरून में आयोजित की जा रही है। इस बैठक में IFD समझौते को मराकेश समझौते (Marrakesh Agreement) में शामिल करने का अनुरोध किया जाएगा, जिसके तहत 1995 में WTO का गठन हुआ था।
मुख्य बिंदु:
- बढ़ता समर्थन: 2017 में जब इस पर पहली बार चर्चा हुई थी, तब इसे 70 देशों का समर्थन प्राप्त था, जो पिछले वर्ष तक बढ़कर 128 देश (कुल 166 सदस्यों में से) हो गया है।
- भारत का विरोध: भारत और दक्षिण अफ्रीका इसके कुछ प्रमुख विरोधियों में शामिल हैं। इसकी वजह से भारत को उन छोटे देशों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है जो निवेश की कमी से जूझ रहे हैं।
- उद्देश्य: इस समझौते का लक्ष्य निवेश के माहौल में सुधार करना और WTO सदस्यों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को सुगम बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। यह विशेष रूप से विकासशील और अल्पविकसित देशों (LDCs) में सतत विकास पर केंद्रित है।
भारत की चिंताएं और ‘बहुपक्षवाद’ (Multilateralism)
भारत ने IFD को ‘बहुपक्षीय मार्ग’ (Plurilateral route) के माध्यम से शामिल करने पर कड़े सवाल उठाए हैं। भारत के तर्क निम्नलिखित हैं:
- सहमति का सिद्धांत: WTO का आधार यह है कि सभी बड़े निर्णय पूरी सदस्यता द्वारा आम सहमति (Consensus) से लिए जाते हैं, जहाँ हर सदस्य की आवाज़ बराबर होती है।
- मल्टीलेटरल बनाम प्लुटिलेटरल (Multilateral vs Plurilateral): पारंपरिक WTO समझौते सभी पर लागू होते हैं, जबकि ‘प्लूरिलेटरल’ सौदे केवल भाग लेने वाले देशों पर लागू होते हैं। भारत का मानना है कि इससे छोटे समूह अपनी मर्जी से आगे बढ़ेंगे, जो WTO के मूल उद्देश्य को विफल कर देगा।
- विकासशील देशों का अहित: भारत का तर्क है कि ऐसे समझौतों के माध्यम से कुछ सदस्य उन क्षेत्रों को निशाना बनाएंगे जो विकासशील देशों और LDCs को प्रभावित करते हैं, और इसमें उनकी राय की आवश्यकता भी नहीं होगी।


