कास्टिक सोडा संयंत्रों के लिए पर्यावरण मानक अधिसूचित: अपशिष्ट जल में ‘मछली जीवित रहने का परीक्षण’ अनिवार्य
केंद्र सरकार ने पर्यावरण (संरक्षण) द्वितीय संशोधन नियम, 2025 के तहत कास्टिक सोडा संयंत्रों के लिए कड़े पर्यावरण मानक अधिसूचित किए हैं। अब मेंब्रेन सेल तकनीक का उपयोग करने वाले इन संयंत्रों के अपशिष्ट जल (wastewater) को प्रयोगशाला में होने वाले ‘फिश सर्वाइवल टेस्ट’ (मछली जीवित रहने का परीक्षण) को पास करना अनिवार्य होगा।
क्या है नया नियम?
नए नियमों के अनुसार, जैविक परख (bioassay) परीक्षण के दौरान, 100 प्रतिशत अपशिष्ट जल में 96 घंटों के बाद कम से कम 90 प्रतिशत मछलियों का जीवित रहना आवश्यक है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मछलियों को औद्योगिक नालों या सीवर में छोड़ा जाएगा। इसके बजाय, कारखाने के अपशिष्ट जल के नमूनों का नियंत्रित प्रयोगशाला स्थितियों में परीक्षण किया जाएगा ताकि यह आकलन किया जा सके कि इसका जीवित जीवों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
यह बदलाव औद्योगिक प्रदूषण के आकलन के तरीके में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अब विनियामक केवल रसायनों की सांद्रता (concentration) ही नहीं मापेंगे, बल्कि यह भी जांचेंगे कि क्या वह अपशिष्ट इतना विषाक्त है कि उससे जीवित जीवों की मृत्यु हो सकती है। यह अधिसूचना 26 मार्च, 2025 को जारी की गई थी।
कास्टिक सोडा उद्योग और पर्यावरणीय चिंताएं
कास्टिक सोडा (सोडियम हाइड्रोक्साइड) भारत में साबुन, डिटर्जेंट, कागज, कपड़ा, एल्युमिनियम, पेट्रोकेमिकल और जल शोधन जैसे उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण रसायन है। भारत में लगभग 32 से 37 कास्टिक सोडा संयंत्र हैं, जो प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन करते हैं।
हालाँकि, यह उद्योग पर्यावरणीय जोखिम भी पैदा करता है क्योंकि इसका अपशिष्ट जल अक्सर अत्यधिक क्षारीय (alkaline) और खारा होता है। इसमें क्लोरीन, हाइड्रोक्लोरिक एसिड और घुले हुए ठोस पदार्थों (TDS) की उच्च मात्रा हो सकती है। नए मानकों के तहत निम्नलिखित सीमाएं तय की गई हैं:
- pH स्तर: 6.5 से 8.5 के बीच।
- क्लोराइड: 250 मिलीग्राम प्रति लीटर।
- कुल निलंबित ठोस (TSS): 100 मिलीग्राम प्रति लीटर।
- कुल घुलित ठोस (TDS): 2,100 मिलीग्राम प्रति लीटर।
मेंब्रेन सेल तकनीक क्या है?
मेंब्रेन सेल तकनीक क्लोरीन और कास्टिक सोडा के उत्पादन की एक अत्यधिक कुशल और चयनात्मक प्रक्रिया है। इसमें एनोड और कैथोड एक झिल्ली (membrane) द्वारा अलग होते हैं, जो केवल सोडियम या पोटैशियम आयनों को गुजरने देती है, लेकिन क्लोरीन या हाइड्रोजन आयनों को रोकती है।
यह तकनीक पारंपरिक डायफ्राम या मरकरी सेल की तुलना में काफी कम बिजली की खपत करती है और इसमें विषाक्त पारे (mercury) या एस्बेस्टस का उपयोग पूरी तरह समाप्त हो जाता है। यह पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाता है।


