तिब्बती मृग (चिरू)

एक नए अध्ययन में पंजाब में वन्यजीव अपराध के उभरते हुए हॉटस्पॉट की पहचान की गई है। पंजाब का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 50,362 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें वन क्षेत्र 3.6% से भी कम है। इस अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि कैसे अवैध शिकार, तस्करी और व्यापार से जुड़े नेटवर्क, निगरानी और कानून-प्रवर्तन में मौजूद कमियों का फ़ायदा उठाकर, इंसानों के वर्चस्व वाले इन इलाकों में खुद को ढाल लेते हैं।

अध्ययन अवधि के दौरान 201 शहतूत शॉल की जब्ती सैकड़ों तिब्बती मृगों की हत्या का संकेत देती है, जो अंतरराष्ट्रीय तस्करी श्रृंखलाओं से जुड़ाव को उजागर करती है। 

तिब्बती मृग या ‘चिरू’ 

प्रजाति: तिब्बती मृग (Pantholops hodgsonii) बोविडे (Bovidae) परिवार की एक अद्वितीय प्रजाति है। हालाँकि इसे कभी-कभी ‘बकरी-मृग’ (goat-antelope) कहा जाता है, लेकिन यह बकरियों और भेड़ों से संबंधित एक विशिष्ट प्रजाति है।

पर्यावास : यह तिब्बती पठार की उच्च-ऊंचाई वाली मृग प्रजाति है। यह चीन के किंघई और शिनजियांग क्षेत्रों और भारत के लद्दाख और काराकोरम क्षेत्रों में पाया जाता है।

विशेषताएं: * नर मृगों के लंबे ऊर्ध्वाधर सींग होते हैं जो लगभग एक वर्ष के बाद बढ़ने लगते हैं और 60 सेंटीमीटर तक लंबे हो सकते हैं।

यह प्रजाति अपनी लंबी दूरी के मौसमी प्रवास (migration) के लिए जानी जाती है।

आर्थिक महत्व और खतरा: तिब्बती मृग अपने अंडरफर (कोमल ऊन) के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसका उपयोग लंबे समय से फैशन आइटम के रूप में शॉल और स्कार्फ बनाने के लिए किया जाता रहा है।

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