बॉन चैलेंज और भारत

COP26 में 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के बावजूद, और वायु प्रदूषण, जल संकट तथा खराब अपशिष्ट प्रबंधन से उत्पन्न बढ़ती जलवायु चुनौतियों के होते हुए भी, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंडिंग में पारिस्थितिक ज़रूरतों को अभी भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

पर्यावरणीय व्यय: एक संवैधानिक अधिदेश 

  • न्यायपालिका का दृष्टिकोण: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने हाल ही में पर्यावरण पर होने वाले खर्च को केवल विवेकाधीन दान (discretionary charity) के बजाय एक संवैधानिक अधिदेश के रूप में परिभाषित किया है।
  • अनुच्छेद 51A (g): न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 51A (g) का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि व्यवसाय करने का अधिकार, हमारे ग्रह को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। 

बॉन चैलेंज और भारत

बॉन चैलेंज निम्नीकृत (डेग्रेडेड) और वनों की कटाई वाली भूमि को बहाल करने का एक वैश्विक और स्वैच्छिक प्रयास है।

  • प्रारंभ: इसे 2011 में जर्मनी और IUCN द्वारा लॉन्च किया गया था।
  • लक्ष्य: 2020 तक 150 मिलियन हेक्टेयर और 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत भूमि को बहाल करना।
  • रणनीति: यह पारिस्थितिक अखंडता और मानव कल्याण को बढ़ाने के लिए वन परिदृश्य बहाली (Forest Landscape Restoration – FLR) का उपयोग करता है।
  • पेरिस में 2015 में आयोजित जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के कॉन्फ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ (COP) में, भारत ने ‘बॉन चैलेंज’ की स्वैच्छिक प्रतिबद्धता में शामिल होते हुए यह संकल्प लिया कि वह वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत और वनों से रहित भूमि को बहाल करेगा। 

भारत की प्रगति और चुनौतियाँ 

  • राष्ट्रीय लक्ष्य: भारत का लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाल करना है।
  • वर्तमान स्थिति: अब तक बहाल किए गए 9.8 मिलियन हेक्टेयर में निजी कंपनियों का योगदान केवल 2% रहा है, जो कि अत्यंत नगण्य है।

निष्कर्ष: यह आंकड़े बताते हैं कि भारत में वनीकरण (Afforestation) और पारिस्थितिक बहाली जैसे क्षेत्रों की निजी क्षेत्र द्वारा उपेक्षा की गई है।

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