UNICEF- चिल्ड्रन्स क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट 2026

यूनिसेफ की चिल्ड्रन्स क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट 2026 उजागर करती है कि कैसे कई आपस में जुड़े जलवायु खतरों के प्रति बच्चों का जोखिम, उनकी आंतरिक शारीरिक संवेदनशीलता और उन सामाजिक सेवाओं में कमियाँ जिन पर वे निर्भर हैं, उनके अधिकारों को नुकसान पहुँचाती हैं और उनके संकट को बढ़ाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आज लगभग सभी बच्चे निम्नलिखित में से कम से कम एक जलवायु खतरे का सामना कर रहे हैं: तटीय बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी, आग, लू (हीटवेव), नदी की बाढ़, रेत और धूल भरी आंधी, और उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) तूफान।

दुनिया के लगभग आधे बच्चे – यानी 1.1 अरब बच्चे – कम से कम तीन ओवरलैपिंग (एक साथ आने वाले) जलवायु खतरों के जोखिम में हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन पर खतरा मँडरा रहा है। 40 लाख से अधिक बच्चे तो ऐसे हैं जो एक साथ छह-छह जलवायु  खतरों का सामना कर रहे हैं। यह रिपोर्ट वायु प्रदूषण और मलेरिया जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों जैसे जलवायु-संवेदनशील खतरों के प्रति बच्चों की स्थिति को भी देखती है। यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में माँग की गई है कि हर बच्चे के एक स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय वातावरण के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए तत्काल, समन्वित और बच्चों के अनुकूल जलवायु नीतियों, कार्रवाइयों और निवेश की आवश्यकता है।

भारत के संदर्भ में मुख्य आँकड़े

16 जून 2026 को जारी इस रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, भारत में 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु या आपदा संबंधी खतरों का सामना कर रहे हैं, जिनमें सूखा, नदी और तटीय बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान, लू, अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग, और रेत एवं धूल भरी आंधी शामिल हैं।

  • तीन या अधिक खतरों का सामना: 23.4 करोड़ से अधिक बच्चे — जो भारत की कुल बाल आबादी का लगभग 55 प्रतिशत है — कम से कम तीन जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षा पर बड़ा जोखिम है।
  • सबसे आम घातक संयोजन: यूनिसेफ के अनुसार, सूखा और अत्यधिक गर्मी का एक साथ होना सबसे आम संयोजन है, जिससे 15.88 करोड़ से अधिक बच्चे प्रभावित हैं।
  • सूखा सबसे बड़ा खतरा: रिपोर्ट के अनुसार, सूखा भारत में बच्चों को प्रभावित करने वाला सबसे व्यापक जलवायु खतरा है। 96 प्रतिशत से अधिक बच्चे (लगभग 41.02 करोड़) ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ कृषि या मौसम संबंधी सूखा पड़ता है, जो खाद्य सुरक्षा, पोषण और आजीविका के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
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