नीदरलैंड्स ने भारत को चोल-युग की अनैमंगलम ताम्र-पट्टिकाएं लौटाईं
नीदरलैंड ने 11वीं शताब्दी की ऐतिहासिक ‘अनैमंगलम ताम्रपत्र’ (Anaimangalam Copper Plates) भारत को वापस सौंप दी हैं, जो दोनों देशों के बीच संबंधों में एक बड़ी उपलब्धि है। चोल राजवंश के सबसे महत्वपूर्ण जीवित अभिलेखों में से एक माने जाने वाले इन ताम्रपत्रों की वापसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान की गई।
चेन्नई सीमा शुल्क विभाग (Customs Department) के अनुसार, अनैमंगलम ताम्रपत्रों के इस सेट में 21 बड़ी प्लेटें और तीन छोटी प्लेटें शामिल हैं।
ताम्रपत्रों का ऐतिहासिक संदर्भ और महत्व
- चोल और शैलेंद्र राजवंश का संबंध: ये ताम्रपत्र प्रसिद्ध चोल शासक राजराज प्रथम (Rajaraja I) द्वारा तमिलनाडु के चोल बंदरगाह शहर नागापट्टिनम में एक बौद्ध विहार (मठ) को दिए गए दान की स्मृति में जारी किए गए थे। इस विहार का निर्माण दक्षिण-पूर्व एशिया के शैलेंद्र शासक चूड़ामणिवर्मन द्वारा करवाया गया था।
- “सुंकम” शब्द का संदर्भ: ऐतिहासिक संदर्भों से पता चलता है कि कुलोत्तुंग चोल (Kulothunga Chola), जिनके बारे में माना जाता है कि वे पूर्वी चालुक्य राजवंश के वंशज थे, “सुंकम” (कर/महसूल) शब्द के उपयोग को प्राथमिकता देते थे। यह शब्द उस काल के दौरान पूरे दक्कन क्षेत्र में आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता था।
ताम्रपत्रों की भाषा और पाठ्य सामग्री
ये शिलालेख संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं में लिखे गए हैं:
- संस्कृत खंड (लेडेन यूनिवर्सिटी के अनुसार): यह हिस्सा चोल राजवंश की वंशावली (genealogy) को दर्शाता है, जिसकी शुरुआत हिंदू देवता भगवान विष्णु से जुड़े पौराणिक वंश से होती है।
- तमिल खंड: यह पाठ राजराज प्रथम (राजेंद्र प्रथम के पिता) की उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है। इसमें उनके शासनकाल के 21वें वर्ष में एक बौद्ध पैगोडा को एक पूरे गाँव का राजस्व दान करने का विवरण है।
धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक: यह कदम राजराज प्रथम की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है, जिन्होंने सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप में फैले श्रीविजय साम्राज्य के एक मलय बौद्ध शासक को नागापट्टिनम में एक अभयारण्य/विहार स्थापित करने की अनुमति दी थी। नागापट्टिनम उस समय कोरोमंडल तट पर एक प्रमुख बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था।


