चुनाव याचिका

तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) के विधायक आर. श्रीनिवासा सेतुपति, जिन्होंने नंबर 185 तिरुप्पत्तूर विधानसभा क्षेत्र से केवल एक वोट से जीत हासिल की थी, ने मद्रास उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा उन्हें तमिलनाडु विधानसभा में शक्ति परीक्षण (floor test) में भाग लेने से रोकने के बाद सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का रुख किया है। उच्च न्यायालय की पीठ ने सेतुपति को तमिलनाडु विधानसभा में “विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, मतविभाजन या किसी भी मतदान प्रक्रिया सहित किसी भी शक्ति परीक्षण (floor test) में मतदान करने या अन्यथा भाग लेने से” रोक दिया था।

विवाद का मुख्य कारण (डाक मतपत्र की त्रुटि)

याचिका के अनुसार, शिवगंगा जिले के निर्वाचन क्षेत्र नंबर 185 तिरुप्पत्तूर से संबंधित एक डाक मतपत्र (postal ballot) गलती से तिरुप्पत्तूर जिले के निर्वाचन क्षेत्र नंबर 50 तिरुप्पत्तूर में भेज दिया गया था। चूंकि दोनों निर्वाचन क्षेत्रों के नाम समान थे, इसलिए मतपत्र कथित तौर पर गलत रिटर्निंग ऑफिसर (Returning Officer) के पास पहुंच गया। इसे सही निर्वाचन क्षेत्र में भेजने के बजाय, उस रिटर्निंग ऑफिसर ने मतपत्र को खारिज कर दिया।

चुनाव आयोग ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि ‘चुनाव संचालन नियम, 1961’ (Conduct of Election Rules, 1961) के तहत गलत तरीके से भेजे गए डाक मतपत्र को एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में स्थानांतरित (transfer) करने का कोई वैधानिक तंत्र (statutory mechanism) नहीं है। ये नियम केवल नियम 54A(2) के तहत निर्धारित समय के बाद प्राप्त मतपत्रों से निपटते हैं। इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो एक रिटर्निंग ऑफिसर से दूसरे रिटर्निंग ऑफिसर को डाक मतपत्र स्थानांतरित करने की अनुमति देता हो।

चुनावी विवादों और न्यायपालिका से संबंधित कानूनी प्रावधान

  • चुनाव याचिका (Election Petition): संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचनों को चुनाव समाप्त होने के बाद ‘चुनाव याचिका’ के माध्यम से उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • अनुच्छेद 329 (Article 329): संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत, एक बार जब चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो न्यायपालिका चुनावों के संचालन पर याचिकाओं को स्वीकार करके हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
  • चुनाव आयोग की सीमाएं: एक बार मतदान पूरा होने और परिणाम घोषित होने के बाद, चुनाव आयोग अपने स्तर पर किसी भी परिणाम की समीक्षा (review) नहीं कर सकता है। इसकी समीक्षा केवल एक चुनाव याचिका की प्रक्रिया के माध्यम से ही की जा सकती है, जिसे संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष दायर किया जा सकता है।
  • राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के संबंध में ऐसी याचिकाएं केवल सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ही दायर की जा सकती हैं। 

न्यायालय का हस्तक्षेप और अपवादसामान्य तौर पर, अदालतें अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाओं (writ proceedings) के माध्यम से चुनावी विवादों में हस्तक्षेप नहीं करती हैं। हालांकि, इस मामले में उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘भारत चुनाव आयोग बनाम अशोक कुमार (2000)’ मामले के ऐतिहासिक फैसले पर भरोसा किया। इस फैसले में एक सीमित अपवाद (narrow exception) को मान्यता दी गई थी, जो उन परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहाँ सबूतों को सुरक्षित रखना या चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली बाधाओं को हटाना आवश्यक हो।

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