दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025
लोकसभा ने 30 मार्च को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पारित कर दिया है। प्रवर समिति (Select Committee) की सिफारिशों के आधार पर तैयार किए गए इस विधेयक में 12 प्रमुख बदलाव प्रस्तावित हैं, जिनका उद्देश्य भारत के दिवाला समाधान ढांचे को और अधिक मजबूत और वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप बनाना है।
यह संशोधन 2016 में लागू मूल IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) के अनुभवों और विभिन्न अदालतों के न्यायिक निर्णयों पर आधारित है।
विधेयक की मुख्य विशेषताएं और प्रस्तावित बदलाव:
- लेनदार-प्रारंभिक समाधान (Creditor-initiated Process): वास्तविक व्यावसायिक विफलताओं के मामले में अदालत के बाहर (out-of-court) दिवाला समाधान शुरू करने के लिए एक नया तंत्र प्रस्तावित किया गया है।
- समूह दिवाला (Group Insolvency): जटिल कॉर्पोरेट समूहों से जुड़ी दिवाला प्रक्रियाओं को अधिक कुशलता से निपटाने के लिए एक ढांचा तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग कार्यवाहियों के कारण होने वाले मूल्य ह्रास (value destruction) को रोकना है।
- सीमा पार दिवाला (Cross-border Insolvency): यह घरेलू और विदेशी दोनों कार्यवाहियों में हितधारकों के हितों की रक्षा करेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय दिवाला प्रक्रियाओं की मान्यता बढ़ेगी और विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।
- क्लीन स्लेट सिद्धांत (Clean Slate Principle): विधेयक में इसे औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है। इसका अर्थ है कि एक बार समाधान योजना (Resolution Plan) स्वीकृत होने के बाद, वे सभी दावे जो उस योजना में शामिल नहीं थे, पूरी तरह समाप्त (Extinguished) माने जाएंगे।
- समय सीमा (Timelines): * परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 180 दिनों की समय सीमा तय की गई है, जिसे विशेष परिस्थितियों में न्यायाधिकरण द्वारा 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
- कंपनी के डिफॉल्ट (चूक) स्थापित होने के बाद 14 दिनों के भीतर दिवाला आवेदन को अनिवार्य रूप से स्वीकार (Mandatory Admission) करने का प्रावधान किया गया है।
महत्व:
विधेयक का मुख्य उद्देश्य तनावग्रस्त कंपनियों के मूल्य को अधिकतम करना और उन्हें एक ‘गोइंग कंसर्न’ (निरंतर चलने वाली इकाई) के रूप में बनाए रखना है। यह व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने और ऋण वसूली की प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।


