दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित

 संसद ने 1 अप्रैल को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया है। 2016 में लागू किए गए मूल IBC का उद्देश्य ऋण चूक (default) करने वाली कंपनियों के समाधान या परिसमापन (liquidation) के लिए एक समयबद्ध तंत्र बनाना था।

2026 के नए संशोधनों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: 

 प्रवेश प्रक्रिया में तेजी (Faster Admission): पहले के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (NCLT) के पास दिवाला आवेदन को स्वीकार करने पर निर्णय लेने के लिए 14 दिन का समय होता था। अब, एक बार डिफॉल्ट (चूक) साबित हो जाने पर NCLT के लिए आवेदन स्वीकार करना अनिवार्य होगा।

लेनदार-पहल दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIIRP): यह एक नई आउट-ऑफ-कोर्ट (न्यायालय से बाहर) शुरुआत करने वाली प्रणाली है:

  • इसे केवल “निर्दिष्ट वित्तीय लेनदारों” द्वारा ही शुरू किया जा सकता है।
  • इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए कम से कम 51% वित्तीय लेनदारों की सहमति अनिवार्य है।

प्री-पैकेज्ड दिवाला समाधान (PPIRP) में बदलाव: PPIRP मुख्य रूप से संकटग्रस्त MSMEs के लिए एक हाइब्रिड पुनर्गठन तंत्र है।

  • मतदान सीमा: PPIRP के लिए वोटिंग थ्रेशोल्ड को घटाकर 51% करने का प्रस्ताव है।
  • नियंत्रण: इसमें ‘ऋणी-के-कब्जे’ (debtor-in-possession) का मॉडल अपनाया जाता है, जिससे कर्जदार अपना नियंत्रण बनाए रखता है।
  • समय सीमा: इसे आमतौर पर 120 दिनों के भीतर NCLT द्वारा अनुमोदित किया जाना होता है।

समूह और सीमा-पार दिवाला: विधेयक में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दो नए ढांचे पेश किए गए हैं:

  • समूह दिवाला (Group Insolvency): एक ही कॉर्पोरेट समूह की विभिन्न कंपनियों के दिवालियापन को एक साथ संभालने की सुविधा।
  • सीमा-पार दिवाला: विदेशी संपत्तियों और लेनदारों से जुड़े मामलों में बेहतर समन्वय।

‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत: विधेयक औपचारिक रूप से इस सिद्धांत को मान्यता देता है। इसका अर्थ है कि एक बार समाधान योजना (Resolution Plan) स्वीकृत हो जाने के बाद, वे सभी दावे जो उस योजना में शामिल नहीं थे, पूरी तरह समाप्त (extinguished) माने जाएंगे। इससे नए खरीदार को बिना किसी पुराने कानूनी बोझ के कंपनी चलाने की सुविधा मिलती है।

परिसमापन (Liquidation) की समय सीमा: यदि समाधान संभव नहीं होता, तो परिसमापन की प्रक्रिया के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं:

  • मानक समय सीमा: 180 दिन।
  • विस्तार: विशेष परिस्थितियों में न्यायाधिकरण द्वारा इसे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। 

विनियामक शक्तियाँ: भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) को अब और अधिक सशक्त बनाया गया है। वह अब लेनदारों की समिति (CoC) के लिए समय सीमा और आचरण के मानक (conduct standards) निर्धारित कर सकेगा।

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