लेह में तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1 मई 2026 को लेह के जीवत्सल में तथागत बुद्ध के पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी (Sacred Holy Relics Exposition) का उद्घाटन किया। ये अवशेष तथागत (पूर्ण प्रबुद्ध बुद्ध) की शिक्षाओं और आध्यात्मिक उपस्थिति के प्रतीक हैं। बुद्ध के पवित्र अवशेषों की यह प्रदर्शनी भारत के स्थायी सभ्यतागत लोकाचार और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को विश्व स्तर पर साझा करने की प्रतिबद्धता की एक गहन अभिव्यक्ति है।
तथागत (Tathāgata) का अर्थ
‘तथागत’ शब्द गौतम बुद्ध को ‘प्रबुद्ध व्यक्ति’ के रूप में संदर्भित करता है, जिन्होंने जन्म और मृत्यु से पूर्ण मुक्ति (निर्वाण) प्राप्त की थी।
पिपरहवा अवशेष (The Piprahwa Relics)
तथागत बुद्ध के ये पवित्र अवशेष पिपरहवा अवशेषों का हिस्सा हैं और गौतम बुद्ध के सबसे श्रद्धेय अवशेषों में से एक माने जाते हैं।
- धार्मिक महत्व: दुनिया भर के बौद्धों के लिए, ये केवल पुरातात्विक कलाकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि भक्ति और ज्ञान के जीवंत प्रतीक (शरीर-धातु) हैं।
- संग्रहण: लद्दाख प्रदर्शनी में प्रदर्शित ये अवशेष नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित हैं।
- मूल स्थान: ये उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित पिपरहवा स्तूप की खुदाई से प्राप्त हुए हैं।
प्रमुख पुरातात्विक खोजें
पिपरहवा स्थल दो प्रमुख खोजों से जुड़ा है:
- प्रथम खुदाई (1898): विलियम क्लैक्सटन पेप्पे (William Claxton Peppe) द्वारा।
- यहाँ से एक पत्थर का संदूक मिला जिसमें पाँच कलश थे। इन कलशों में हड्डियों के टुकड़े, राख, कीमती पत्थर और सोने की परतें थीं।
- सोने की परतों पर पवित्र रूपांकनों (motifs) की नक्काशी की गई थी।
- विशेष खोजों में मछली के आकार के हैंडल वाला एक स्फटिक (Crystal) ताबूत और मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में खुदा हुआ एक सोपस्टोन (Soapstone) ताबूत शामिल था।
- अभिलेख ने इन अवशेषों की पहचान बुद्ध के अवशेषों के रूप में की और इस स्थल को शाक्यों की प्राचीन राजधानी कपिलवस्तु से जोड़ा।
- द्वितीय खुदाई (1971–1977): भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के के.एम. श्रीवास्तव के नेतृत्व में।
- इस खुदाई में दो बिना शिलालेख वाले सोपस्टोन ताबूत मिले, जिनमें 22 अस्थि अवशेष थे।
- ये अवशेष 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के हैं।
- माना जाता है कि ये उस मूल स्तूप का हिस्सा हैं, जिसे बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद शाक्य वंश द्वारा बनवाया गया था।
अवशेषों का वितरण1898 की खुदाई के बाद अवशेषों का एक बड़ा हिस्सा वितरित कर दिया गया था। कुछ अवशेष निजी संग्रह में रह गए, जबकि अन्य को भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में स्थानांतरित कर दिया गया था। वर्तमान में, प्रदर्शनी के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रमुख अवशेष राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली की धरोहर हैं।


