एलिफेंटा द्वीप पर 1500 वर्ष पुराना जलाशय मिला
एलिफेंटा द्वीप (Elephanta Island) पर पत्थर और ईंटों से बना एक जलाशय मिला है, जिसके 1500 वर्ष से अधिक पुराना होने का अनुमान है। यह खोज दर्शाती है कि कैसे प्राचीन निवासी भारी वर्षा और पथरीली जमीन (जो पानी नहीं रोक पाती) के बावजूद पीने के पानी का प्रबंधन करते थे।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नेतृत्व में चल रही खुदाई में एक आयताकार जलाशय का पता चला है, जिसके उत्तर में सीढ़ीदार विस्तार है, जो मिलकर एक ‘T’ आकार का सीढ़ीदार टैंक बनाता है। द्वीप के पूर्वी हिस्से में मोराबंदर (Morabandar) में स्थित इस खुदाई का उद्देश्य द्वीप पर शुरुआती बस्तियों के कालक्रम और प्रकृति को स्थापित करना है।
खोज की मुख्य विशेषताएं:
- इंजीनियरिंग कौशल: एलिफेंटा अपने गुफा स्मारकों (rock-cut monuments) के लिए जाना जाता है, लेकिन यह टैंक नक्काशीदार नहीं बल्कि निर्मित (engineered) है, जो बुनियादी ढांचे के प्रति एक अलग दृष्टिकोण दिखाता है।
- व्यापारिक संबंध: पुरातत्वविदों को यहाँ से इंडो-भूमध्यसागरीय एम्फोरा (amphora) के टुकड़े और अन्य आयातित चीनी मिट्टी व कांच की वस्तुएं मिली हैं, जो लंबी दूरी के व्यापार नेटवर्क में द्वीप की भागीदारी का संकेत देती हैं।
एलिफेंटा द्वीप और गुफाओं के बारे में:
- स्थान: रायगढ़ जिले में स्थित यह द्वीप मुंबई के अपोलो बंदर से लगभग 11 किमी उत्तर-पूर्व में है। इसे स्थानीय रूप से ‘घारापुरी’ के नाम से जाना जाता है।
- नामकरण: इस द्वीप का नाम यहाँ मिले एक विशाल हाथी की मूर्ति के कारण पड़ा था।
- स्थापत्य: यहाँ कुल सात गुफाएं हैं, जिनका समय लगभग 6वीं-7वीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है।
- गुफा संख्या 1: यह सबसे प्रभावशाली है और विकसित ब्राह्मणवादी वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी योजना एलोरा की डुमर लेणा (गुफा 29) से मिलती-जुलती है।
- महत्वपूर्ण मूर्तियां: यहाँ अर्धनारीश्वर, शिव-पार्वती (चौसर खेलते हुए) और सबसे प्रसिद्ध ‘महेश-मूर्ति’ स्थित है। महेश-मूर्ति शिव के तीन रूपों—अघोर (उग्र), तत्पुरुष (सौम्य) और वामदेव (मनोहारी)—का एक विशाल मुखशिल्प है।
ऐतिहासिक महत्व:
एलिफेंटा की गुफाएं मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित हैं और इन्हें एकाश्म मंदिरों (monolithic temples) के रूप में संरक्षित किया गया है। अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के कारण, 1987 में एलिफेंटा गुफाओं को यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।


