दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वर्षा का पूर्वानुमान

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) की वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का 92% रहने की संभावना है। यह “सामान्य से कम” (Below Normal) मानसून का संकेत देता है।

मानसून पूर्वानुमान 2026: मुख्य बिंदु

  • वर्षा का अनुमान: इस साल बारिश LPA का 92% (± 5% त्रुटि के साथ) रहने की उम्मीद है। 1971-2020 की अवधि के लिए देश भर में मौसमी वर्षा का LPA 87 सेमी है।
  • हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): वर्तमान में हिंद महासागर में ‘तटस्थ’ (Neutral) स्थिति बनी हुई है। हालांकि, जलवायु मॉडल संकेत दे रहे हैं कि मानसून सीजन के अंत तक ‘धनात्मक IOD’ (Positive IOD) विकसित हो सकता है।
  • ENSO की स्थिति: प्रशांत महासागर में वर्तमान में ‘कमजोर ला नीना’ (Weak La Niña) की स्थिति ‘तटस्थ’ (ENSO-neutral) स्थिति में बदल रही है। समुद्र की सतह के तापमान (SST) का भारतीय मानसून पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए IMD इसकी बारीकी से निगरानी कर रहा है।
  • बर्फ का आवरण (Snow Cover): जनवरी से मार्च 2026 के दौरान उत्तरी गोलार्ध में बर्फ का आवरण सामान्य से थोड़ा कम रहा।
    • वैज्ञानिक संबंध: यूरेशिया और उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों और वसंत की बर्फबारी और आने वाले मानसून के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध (Inverse Relationship) होता है (यानी कम बर्फबारी अक्सर बेहतर मानसून का संकेत देती है, लेकिन अन्य कारक भी महत्वपूर्ण हैं)।

महत्वपूर्ण अवधारणाएँ

इन तीन भौगोलिक कारकों का भारतीय मानसून पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है:

  1. एल नीनो और ला नीना (ENSO): एल नीनो आमतौर पर मानसून को कमजोर करता है, जबकि ला नीना इसे बेहतर बनाता है।
  2. इंडियन ओशन डिपोल (IOD): इसे ‘हिंद महासागर का एल नीनो’ भी कहा जाता है। ‘पॉजिटिव IOD’ भारतीय मानसून के लिए फायदेमंद माना जाता है।
  3. LPA (Long Period Average): यह एक विशेष अवधि (जैसे 50 वर्ष) के दौरान हुई औसत वर्षा का आंकड़ा है, जिसे ‘सामान्य’ वर्षा का मानक माना जाता है।
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