नई स्टडी के अनुसार, पक्षी का पर्यावास उसके गाने को बदल सकता है
इंसानी भाषा की तरह ही पक्षियों के गीत (बर्डसॉन्ग) भी लगातार बदलते और विकसित होते रहते हैं। पक्षियों की हर नई पीढ़ी यह तय करती है कि उन्हें कौन से गीत गाते रहना है, किनमें सुधार करना है और किन्हें हमेशा के लिए छोड़ देना है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी मूल की एक छोटी गौरैया, ‘बैकमेन्स स्पैरो’ (Bachman’s sparrow), अपने समुदाय के सैकड़ों गीतों में से केवल 48 गीत ही सीख पाती है। दशकों से शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि ये नन्हीं गौरैयां सीखने के लिए किन गीतों का चुनाव करती हैं।
अब तक के अध्ययनों में इसका कारण सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों को माना जाता था। विकास के उस महत्वपूर्ण दौर में जब ये चूज़े गीत सीख रहे होते हैं, वे अपने समूह के उन वयस्क नरों (वयस्क नर गौरैया) की नकल करते हैं जो मादा को रिझाने में सफल होते हैं या जिनके पंख अधिक सुंदर और आकर्षक होते हैं।
भौतिक वातावरण की भूमिका
‘बैकमेन्स स्पैरो’ पर हुए एक नए अध्ययन ने इस पहेली में एक और महत्वपूर्ण कड़ा जोड़ दिया है: भौतिक वातावरण (Physical Environment)।
शोधकर्ताओं के अनुसार, पेड़, घनी झाड़ियाँ और यहाँ तक कि हवा भी कुछ ध्वनि तरंगों (साउंड वेव्स) के प्रसार को रोक सकती हैं या उन्हें बिखेर सकती हैं। वैज्ञानिकों को संदेह है कि युवा गौरैयां उन गीतों को नहीं सीख पातीं जिनकी आवाज़ वातावरण के कारण खराब या धुंधली (degraded) हो जाती है। नतीजा यह होता है कि कुछ गीत धीरे-धीरे दुर्लभ (rare) हो जाते हैं।
इस अध्ययन से यह भी सामने आया है कि ये दुर्लभ हो चुके गीत, आम गानों की तुलना में अधिक दूरी तक नहीं गूँज पाते हैं।
शोधकर्ताओं ने गौरैया के कई दुर्लभ और आम गीतों को रिकॉर्ड किया। इसके बाद, उन्होंने इन गानों को उन अलग-अलग वातावरणों में बजाकर दोबारा रिकॉर्ड किया जहाँ ये गौरैयां अक्सर पाई जाती हैं—जैसे घने पेड़ों के बीच, हवादार मैदान और अन्य ऐसी जगहें जो ऑडियो सिग्नलों को बिगाड़ सकती हैं।
इन कठिन परिस्थितियों में, दुर्लभ श्रेणी वाले गीत उतने बेहतर तरीके से दूर तक नहीं पहुँच पाए जितने बेहतर ढंग से आम (common) गीत पहुँच रहे थे।
‘अकॉस्टिक एडाप्टेशन हाइपोथिसिस’ की पुष्टि
यह नई खोज और पुराने शोध ‘अकॉस्टिक एडाप्टेशन हाइपोथिसिस’ का समर्थन करते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि किसी भी जीव का पर्यावास (हैबिटेट) और वहाँ की जलवायु इस बात को तय करती है कि वे जानवर कैसे आवाजें निकालेंगे।
इसके कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं:
- बंदर: घने वर्षावनों (रेनफॉरेस्ट) में रहने वाले बंदर कम आवृत्ति (लो-फ्रीक्वेंसी) पर जोर से चिल्लाते हैं, ताकि उनकी आवाज पेड़ों के पार आसानी से सुनी जा सके।
- मेंढक: तेज बहते पानी के पास रहने वाले मेंढकों की कर्कश और तीखी आवाजें (श्रिल क्रोक्स) पानी के शोर को चीरती हुई दूर तक जाती हैं।
स्रोत: न्यूयॉर्क टाइम्स
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