जम्मू-कश्मीर में पांच ग्लेशियर झीलों से GLOF का खतरा
जम्मू-कश्मीर में हिमनद झीलों के प्रस्फोट आने वाली बाढ़ (GLOF – Glacial Lake Outburst Flood) का खतरा बढ़ गया है। कश्मीर विश्वविद्यालय के ‘जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, कश्मीर हिमालय की पांच प्रमुख झीलों को ‘अति उच्च संवेदनशीलता’ (very high susceptibility) वाली श्रेणी में रखा गया है।
मार्च 2026 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सत्र के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस अध्ययन का हवाला देते हुए इस गंभीर खतरे की ओर ध्यान आकर्षित किया।
अध्ययन में निम्नलिखित पांच झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है:
- ब्रह्मसर (Bramsar)
- छिरसर (Chirsar)
- नंदकोल (Nundkok)
- गंगाबल (Gangabal)
- भागसर (Bhagsar)
क्या है GLOF और यह क्यों होती है?
ग्लेशियर या हिमनद झील तब बनती है जब पिघलता हुआ ग्लेशियर अपने पीछे मलबे की एक दीवार छोड़ जाता है, जिसे ‘हिमोढ़’ या ‘मोरेन’ (moraine) कहा जाता है। यह हिमोढ़ सदियों से पहाड़ों से नीचे लाए गए पत्थरों, ढीली मिट्टी और चट्टानों का एक अव्यवस्थित ढेर होता है। यह किसी इंजीनियर द्वारा बनाए गए बांध की तरह मजबूत नहीं होता।
जब यह प्राकृतिक बांध टूटता है, तो पानी और मलबा अचानक घाटी में प्रचंड वेग से नीचे आता है। इसे ही GLOF कहा जाता है।
खतरे के मुख्य कारण:
- जलवायु परिवर्तन: जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, नए ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें आकार में बढ़ रही हैं।
- विनाशकारी क्षमता: बहुत कम समय में बड़ी मात्रा में पानी का रिसाव होने के कारण यह नीचे के इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है।
- ऐतिहासिक उदाहरण: वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा इसका एक प्रमुख उदाहरण है। वहीं, अक्टूबर 2023 में सिक्किम की ‘साउथ लहोनक झील’ के फटने से तीस्ता नदी घाटी में भारी तबाही हुई थी, जिससे लगभग 5 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी निकला था।
- हालाँकि, आईसीआईएमओडी (ICIMOD) के अनुसार, फरवरी 2021 की चमोली आपदा GLOF के कारण नहीं थी, क्योंकि उस क्षेत्र में ऐसी कोई बड़ी ग्लेशियर झील नहीं थी।
सरकारी पहलें
ग्लेशियर झीलों से होने वाले जोखिमों को कम करने के लिए भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय ग्लेशियर झील बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण परियोजना’ (NGRMP) को मंजूरी दी है। यह परियोजना चार राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड—में 150 करोड़ रुपये की लागत से लागू की जा रही है।


