दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के दस वर्ष पूरे हुए
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), जो 2016 में लागू हुई थी, ने 28 मई को अपने अस्तित्व के 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह संहिता केवल एक विधायी सुधार के रूप में नहीं, बल्कि ऋण बाजारों, कॉर्पोरेट व्यवहार, निवेशक विश्वास और आर्थिक दक्षता के लिए दूरगामी निहितार्थों के साथ एक संस्थागत परिवर्तन के रूप में उभरी है। इस संहिता ने ऋण अनुशासन को बढ़ावा देने और कर्जदारों के बीच पुनर्भुगतान संस्कृति को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मार्च 2026 तक, एक हजार 419 से अधिक मामलों में समाधान योजनाएं (resolution plans) प्राप्त हुई हैं, और इसने लेनदारों के लिए चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की वसूली को सुगम बनाया है।
पृष्ठभूमि और उद्देश्य दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अधिनियमन से पहले, भारत में दिवाला समाधान कई परस्पर व्याप्त (overlapping) कानूनी ढांचे के माध्यम से संचालित होता था। वित्तीय संकट का सामना कर रही कंपनियों को विभिन्न कानूनों जैसे कंपनी अधिनियम, बीमार औद्योगिक कंपनी अधिनियम (SICA), ऋण वसूली तंत्र और SARFAESI सहित सुरक्षित लेनदार ढांचे के तहत निपटाया जाता था। ये प्रक्रियाएं अलग-अलग संस्थानों और मंचों के माध्यम से काम करती थीं, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर कार्यवाही खंडित हो जाती थी और अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) ओवरलैप हो जाते थे। नतीजतन, समाधान प्रक्रियाएं अक्सर लंबी और अनिश्चित हो जाती थीं।
IBC, 2016 ने कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के लिए दिवाला समाधान हेतु एक एकीकृत ढांचा स्थापित किया। इसने कई दिवाला समाधान कानूनों को एक एकल संरचना में समेकित किया, जिससे एक अधिक समन्वित और पूर्वानुमानित समाधान प्रक्रिया का निर्माण हुआ। संहिता द्वारा पेश किया गया एक प्रमुख उद्देश्य ‘ऋणी-नियंत्रित’ (debtor-controlled) प्रणाली से ‘कर्जदाता-संचालित’ (creditor-driven) समाधान ढांचे (लिक्विडेशन फ्रेमवर्क) की ओर संक्रमण था।
ढांचा और तंत्र इस ढांचे के केंद्र में ‘कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया’ (CIRP) है, जो कॉर्पोरेट दिवाला को हल करने के लिए एक संरचित तंत्र प्रदान करती है। क्रेडिटर्स समिति (CoC), जिसमें वित्तीय ऋणदाता शामिल होते हैं, समाधान योजनाओं का मूल्यांकन करती है। वे तब तनावग्रस्त इकाई के भविष्य के संबंध में महत्वपूर्ण व्यावसायिक निर्णय लेते हैं। संहिता ने समाधान के लिए एक समय-सीमा आधारित संरचना भी पेश की। CIRP को 180 दिनों के भीतर पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसे विशिष्ट परिस्थितियों में 330 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
‘भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड’ (IBBI) विनियामक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, जो दिवाला प्रक्रियाओं, दिवाला समाधान पेशेवरों (IPs) और ढांचे के तहत संबंधित संस्थानों की देखरेख के लिए जिम्मेदार है। यह दिवाला समाधान प्रणाली के कामकाज को नियंत्रित करने वाले विनियम और मानक भी बनाता है। IP संकटग्रस्त संस्थाओं के मामलों का प्रशासन करते हैं, संपत्तियों की सुरक्षा करते हैं और लेनदारों की बैठकों की सुविधा प्रदान करते हैं। वे संहिता और लागू विनियमों के अनुपालन में समाधान प्रक्रिया की देखरेख करते हैं। साथ ही, कॉरपोरेट दिवाला मामलों का न्यायनिर्णयन ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण’ (NCLT) द्वारा किया जाता है, जो ढांचे के तहत न्याय निर्णय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। इसके निर्णयों के खिलाफ अपील ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण’ (NCLAT) द्वारा सुनी जाती है।
संशोधन और विकास 2019 के संशोधन ने प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 330 दिनों की कुल समय सीमा शुरू करके दिवाला समाधान ढांचे में सुधार किया। 2021 के संशोधन ने MSME के लिए ‘प्री-पैकेज्ड’ दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू की। 2026 का संशोधन अधिनियम उन कमियों को दूर करता है जो 2016 के मूल अधिनियम में समय के साथ सामने आई थीं।
- जवाबदेही: न्यायनिर्णय प्राधिकरण को 14 दिनों के भीतर आवेदनों पर निर्णय लेना होगा। यदि इस समय-सीमा का पालन नहीं किया जाता है, तो कारणों को औपचारिक रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। यह प्रणाली में जवाबदेही लाता है।
- ऋणदाताओं की भूमिका: संशोधन परिसमापन (liquidation) चरण में ऋणदाताओं की भूमिका का विस्तार करता है। उन्हें परिसमापन के संचालन की निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर परिसमापक (liquidator) को बदलने का अधिकार दिया गया है। लेनदार पूरी दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान नियंत्रण में बने रहते हैं।
- संपत्ति का विस्तार: संशोधन लेनदारों के अनुमोदन और कुछ शर्तों के अधीन, गारंटरों (guarantors) की संपत्तियों को समाधान प्रक्रिया में शामिल करने की अनुमति देता है। संपत्तियों के दायरे को व्यापक बनाकर, विशेष रूप से गारंटी से जुड़े जटिल वित्तीय ढांचे में, वसूली की संभावनाएं बेहतर होती हैं।


