झरिया कोयला क्षेत्र की भूमिगत आग से ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन

झारखंड के झरिया कोयला क्षेत्रों के नीचे दशकों से आग लगी हुई है, जिससे जमीन की दरारों से धुआं और गैसें लगातार बाहर निकल रही हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार, इस भूमिगत अग्नि प्रणाली के कुछ हिस्से पहले के अनुमानों की तुलना में अधिक गर्म हो सकते हैं और अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष: यू.के. और भारत के शोधकर्ताओं (जिसमें सीएसआईआर-केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान, CIMFR भी शामिल है) ने 18 मई को कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि जब भूमिगत आग कोयले की परतों को जला देती है और ऊपर की चट्टानों को अस्थिर कर देती है, तो इससे ‘कोलैप्स स्ट्रक्चर्स’ (धंसने वाली संरचनाएं) बनती हैं। ये संरचनाएं जमीन के भीतर 100 मीटर से अधिक गहराई तक लंबवत फैल सकती हैं और गर्म गैसों को सीधे वायुमंडल में छोड़ती हैं।

ऐतिहासिक और पर्यावरणीय प्रभाव:

  • आग की शुरुआत: झरिया की कोयला खदानों में लगी यह भूमिगत आग 1916 में किसी अज्ञात कारण से शुरू हुई थी।
  • निरंतरता: भारत सरकार और स्थानीय अधिकारियों द्वारा इसे बुझाने के तमाम बड़े प्रयासों के बावजूद, यह आग अब तक नहीं बुझ पाई है।

संसाधनों और पर्यावरण का नुकसान: प्राइम कोकिंग कोल का यह निरंतर जलना हर साल लाखों टन संसाधनों को नष्ट कर रहा है। इसके साथ ही, यह नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOX), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और मीथेन (CH4) जैसी हानिकारक गैसों का भारी मात्रा में उत्सर्जन कर रहा है।

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