महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर: अटूट मित्रता और वैचारिक मतभेद
महात्मा गांधी और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बीच का रिश्ता भारतीय इतिहास के सबसे खूबसूरत और बौद्धिक अध्यायों में से एक है। दोनों एक-दूसरे का गहरा सम्मान करते थे (गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि टैगोर ने दी थी, और टैगोर को ‘गुरुदेव’ की उपाधि गांधीजी ने दी थी), लेकिन उनके वैचारिक मतभेद भी उतने ही गहरे थे।
महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर: अटूट मित्रता और वैचारिक मतभेद
नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती 7-9 मई 2026 के आसपास अत्यधिक उत्साह के साथ मनाई गई, जो 7 मई 1861 को उनके जन्म का प्रतीक है। गांधी और टैगोर के बीच एक स्थायी मित्रता थी जो 1914-15 से लेकर 1941 में टैगोर के निधन तक बनी रही। लेकिन इसके साथ ही, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों को लेकर उनके बीच गहरे मतभेद भी थे।
सम्मान पर टिकी गहरी दोस्ती के बावजूद, उनके बीच का वैचारिक टकराव शायद अपरिहार्य था। इसके शुरुआती संकेत 1915 में तब दिखे, जब दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधीजी ने शांतिनिकेतन का दौरा किया था। दोनों के बीच राष्ट्रवाद से लेकर शिक्षा और राजनीति जैसे कई विषयों पर असहमति थी।
राष्ट्रवाद और आंदोलनों पर मतभेद
अमृतसर (जलियांवाला बाग) नरसंहार के बाद यह दूरी और बढ़ गई, जब गांधीजी ने असहयोग जैसे आंदोलन शुरू किए। टैगोर को चिंता थी कि ये आंदोलन ‘अंध राष्ट्रवाद’ (blind nationalism) को बढ़ावा दे सकते हैं। इसके बजाय, उन्होंने विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि त्याग दी थी।
1934 का बिहार भूकंप: विज्ञान बनाम आस्था
1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप के बाद, गांधीजी ने इस आपदा को एक “दैवीय दंड” (divine chastisement) कहा था, जो उनके अनुसार उच्च जातियों द्वारा हरिजनों के खिलाफ किए गए महापाप का परिणाम था। टैगोर इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि प्राकृतिक आपदाओं को नैतिक कारणों से जोड़ना अतार्किक है।
चरखा आंदोलन और खादी की अनिवार्यता पर विवाद
टैगोर उस नैतिक तानाशाही से बेहद असहज थे, जो उन्हें कताई आंदोलन—यानी ‘चरखे के पंथ’ (cult of the charkha) और कांग्रेस के खादी (हाथ से काते गए कपड़े) पहनने के अनिवार्य निर्देश में दिखाई देती थी। नवंबर 1924 में, गांधीजी और अन्य कांग्रेस नेताओं ने प्रस्ताव पारित किया कि सभी कांग्रेस सदस्यों को राजनीतिक या कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेते समय खादी पहनना अनिवार्य होगा, और हर महीने 2,000 यार्ड (गज) समान रूप से काता हुआ सूत योगदान देना होगा।
- गांधीजी का मानना था कि इससे न केवल भारत कपड़ों के मामले में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि यह कांग्रेस कार्यकर्ताओं का नैतिक रूप से हृदय परिवर्तन भी करेगा।
- टैगोर ने इससे कड़ा विरोध जताया। उन्होंने इस निर्देश को “प्रिंटर की स्याही में निंदा” (censure in printer’s ink) कहकर खारिज कर दिया और ‘द मॉडर्न रिव्यू’ (The Modern Review) में ‘द कल्ट ऑफ द चरखा’ (The Cult of the Charkha) नामक निबंध लिखकर इसका जवाब दिया।
आधुनिक दुनिया और विज्ञान पर दृष्टिकोण
टैगोर इस विचार के भी सख्त खिलाफ थे कि भारत खुद को आधुनिक दुनिया से अलग कर ले। उनका मानना था कि विज्ञान और तकनीक से दूरी बनाना देश को मजबूत करने के बजाय और अधिक दरिद्र (कमजोर) बना देगा। वे पश्चिमी ज्ञान और भारतीय आध्यात्मिकता के मिलन के पक्षधर थे।


