दुर्लभ रोगों पर दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन
नई दिल्ली में 5 और 6 मई, 2026 दुर्लभ रोगों पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) की चुनौतियों से निपटने और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास था।
दुर्लभ रोग क्या हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुर्लभ रोग ऐसी स्थितियाँ हैं जो बहुत कम लोगों को प्रभावित करती हैं।
- प्रसार (Prevalence): आमतौर पर 1,00,000 में से 65 से कम लोग या 2,000 व्यक्तियों में से 1 व्यक्ति इससे प्रभावित होता है।
- प्रकृति: लगभग 80% दुर्लभ बीमारियाँ आनुवंशिक (Genetic) होती हैं और अक्सर बचपन में ही दिखाई देने लगती हैं।
- प्रभाव: लगभग 50% नए मामले बच्चों में देखे जाते हैं, जो बाल मृत्यु दर का एक बड़ा कारण बनते हैं।
राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति, 2021 और मुख्य प्रगति
भारत ने 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के बाद, 2021 में एक व्यापक ढांचा तैयार किया। इसकी प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार हैं:
- उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence – CoEs): इन बीमारियों के इलाज के लिए विशेष ‘सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस’ बनाए गए हैं। इन केंद्रों की संख्या 8 से बढ़ाकर 15 कर दी गई है, जिनमें उत्तर-पूर्व भारत के दो केंद्र भी शामिल हैं।
- वित्तीय सहायता: नीति के तहत मरीजों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता को बढ़ाकर ₹50 लाख कर दिया गया है।
- सीमा शुल्क में छूट: सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं को बुनियादी सीमा शुल्क (Basic Customs Duty) से छूट दी है, जिससे इलाज की लागत कम हुई है।
चुनौतियाँ और आवश्यकताएँ
दुर्लभ रोगों का प्रबंधन कठिन है क्योंकि:
- इनका निदान (Diagnosis) जटिल और समय लेने वाला होता है।
- दवाएं और उपचार अत्यंत महंगे होते हैं।
- जागरूकता की कमी के कारण अक्सर इलाज में देरी होती है।


