SBI ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा IBC की कार्यवाही में ‘स्पेक्ट्रम’ को संपत्ति नहीं मानने वाले फैसले पर पुनर्विचार की मांग की

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया था कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency & Bankruptcy Code: IBC) के तहत टेलीकॉम स्पेक्ट्रम को ‘संपत्ति’ (Asset) नहीं माना जा सकता।  

विवाद का मुख्य केंद्र

विवाद इस बात पर है कि क्या सरकार द्वारा टेलीकॉम ऑपरेटरों को आवंटित स्पेक्ट्रम को कंपनी की संपत्ति माना जा सकता है और क्या IBC के तहत दिवाला-समाधान कार्यवाही में इसका उपयोग किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (13 फरवरी, 2026)

  • सार्वजनिक ट्रस्ट का सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक संसाधन है जिसे सरकार जनता के भरोसे (trust) के रूप में रखती है।
  • स्वामित्व बनाम उपयोग का अधिकार: टेलीकॉम कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम का केवल सीमित उपयोग का अधिकार है, स्वामित्व नहीं।
  • IBC से बाहर: कोर्ट के अनुसार, ऐसे अधिकारों को IBC के तहत ‘संपत्ति’ नहीं माना जा सकता। दिवाला-समाधान कार्यवाही का उपयोग स्पेक्ट्रम से जुड़े सरकारी बकाया को पुनर्गठित करने या समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
  • लेंडर्स (ऋणदाताओं) पर प्रभाव: इस फैसले ने दिवाला समाधान के दौरान स्पेक्ट्रम अधिकारों पर निर्भर रहने की बैंकों की क्षमता को सीमित कर दिया है। 

SBI के तर्क और चिंताएं

SBI ने अपनी याचिका में निम्नलिखित कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दों को उठाया है:

  • क्रेडिट मार्केट पर प्रतिकूल प्रभाव: यदि स्पेक्ट्रम और इसी तरह के अधिकारों को संपत्ति नहीं माना जाता है, तो बैंक टेलीकॉम और बुनियादी ढांचे (infrastructure) जैसे क्षेत्रों को ऋण देने पर पुनर्विचार कर सकते हैं, जो सरकारी लाइसेंसों पर निर्भर हैं।
  • वित्तीय विवरणों में स्थान: टेलीकॉम कंपनियों ने स्पेक्ट्रम उपयोग अधिकार प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण राशि का भुगतान किया है और उन्हें अपने वित्तीय विवरणों (Financial Statements) में ‘संपत्ति’ के रूप में दर्ज किया है।
  • सुरक्षित लेनदार (Secured Creditors) की स्थिति: बैंकों ने इन अधिकारों के बदले ऋण दिया है, जो लाइसेंस और स्पेक्ट्रम उपयोग पर सुरक्षा हितों (security interests) द्वारा समर्थित थे। यदि इन्हें दिवाला-समाधान प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, तो बैंकों की बकाया वसूली की क्षमता कमजोर हो जाएगी। 

आगे के निहितार्थ

यह मामला भारत के दिवाला-समाधान ढांचे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि भविष्य में लाइसेंस-आधारित उद्योगों में ऋण की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। यदि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को बरकरार रखता है, तो बैंकों को अपनी लैंडिंग (Lending) नीतियों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

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