शहतूश शॉल के अवैध निर्यात के मामले में दोषी को सजा

नई दिल्ली की एक अदालत ने जयपुर के एक आर्ट गैलरी मालिक को तिब्बती मृग (Chiru) के बालों से बनी शहतूश शॉल के अवैध निर्यात के प्रयास के लिए दोषी ठहराया है। यह मामला वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के उल्लंघन से संबंधित है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • दोषी: सैयद शाहिद अहमद काशानी, प्रोप्राइटर- मेसर्स इंडियन आर्ट गैलरी, जयपुर।
  • तारीख: फैसला 12 मार्च, 2026 को राउज एवेन्यू जिला न्यायालय द्वारा सुनाया गया।
  • घटना: यह मामला दिसंबर 2008 में शुरू हुआ था, जब इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर निर्यात खेप में 1,290 शहतूश शॉल की पहचान की गई थी।

एजेंसी समन्वय की भूमिका

यह मामला लगभग 17 वर्षों तक चार प्रमुख एजेंसियों के बीच चले निरंतर समन्वय के कारण अद्वितीय है:

  1. वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB): निर्यात खेप में शहतूश की पहचान की और शिकायत दर्ज की।
  2. केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI): पहली बार किसी वन्यजीव अपराध का अभियोजन (prosecution) CBI के माध्यम से किया गया।
  3. सीमा शुल्क (Customs): प्रारंभिक जब्ती और जांच में सहयोग।
  4. भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII): देहरादून स्थित इस संस्थान ने फॉरेंसिक जांच के माध्यम से पुष्टि की कि 41 शॉलों में तिब्बती मृग के बाल मौजूद थे।

कानूनी स्थिति और सुरक्षा

  • चिरू (Tibetan Antelope): यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध है, जिसके तहत इसका व्यापार पूरी तरह प्रतिबंधित है।
  • CITES: शहतूश शॉल के व्यापार पर 1975 से वैश्विक प्रतिबंध है, जिसमें भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।
  • प्रक्रिया: पश्मीना शॉल के निर्यात के लिए वन्यजीव अधिकारियों से ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) की आवश्यकता होती है, जिसके दौरान इस अवैध खेप को पकड़ा गया था।

अदालत का फैसला

अदालत ने आरोपी को निम्नलिखित सजा सुनाई:

  • कारावास: धारा 49B(1)/51(1A) के तहत 3 साल का साधारण कारावास।
  • जुर्माना: ₹50,000 का आर्थिक दंड।
  • अतिरिक्त सजा: धारा 40 और 49 के तहत 2-2 साल की अतिरिक्त समवर्ती (concurrent) सजा।
  • जब्ती: सभी जब्त की गई शॉल अब सरकारी संपत्ति बन जाएंगी।
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