स्लेंडर लोरिस
तमिलनाडु के मदुरै जिले के मेलूर तालुक में पाए जाने वाले ग्रे स्लेंडर लोरिस (Grey Slender Loris) के संरक्षण को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता और जनता लगातार सरकार से अपील कर रहे हैं। यहाँ इस अनोखे जीव और इसके संरक्षण से जुड़ी मुख्य जानकारी का हिंदी अनुवाद दिया गया है:
ग्रे स्लेंडर लोरिस: एक परिचय
ग्रे स्लेंडर लोरिस (Loridae परिवार) एक छोटा, निशाचर (nocturnal) प्राइमेट है, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत और श्रीलंका के उष्णकटिबंधीय झाड़ियों और पर्णपाती वनों में पाया जाता है।
- दिखावट: इनकी सबसे प्रमुख विशेषता इनकी दो बड़ी, पास-पास स्थित भूरी आँखें हैं। इनकी एक छोटी, अवशेषी पूंछ (vestigial tail) होती है।
- आवास: ये घनी, कांटेदार झाड़ियों और बांस के झुरमुटों में रहना पसंद करते हैं ताकि शिकारियों से बच सकें। ये वृक्षवासी (arboreal) होते हैं और अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर ही बिताते हैं।
- सामाजिक जीवन: ये भोर (dawn) और शाम (dusk) के समय बहुत सामाजिक होते हैं और अपने समूह के अन्य सदस्यों के साथ मेल-जोल बढ़ाते हैं।
- प्रजनन: मादा आमतौर पर एक बार में एक ही शिशु को जन्म देती है, और दुर्लभ मामलों में दो।
- मुख्य आहार: स्लेंडर लोरिस का मुख्य आहार कीड़े-मकौड़े हैं, लेकिन इसके अलावा वे निम्नलिखित चीजें भी खाते हैं: पत्तियां और फूल स्लग (बिना खोल वाले घोंघे), कभी-कभी पक्षियों के अंडे
संरक्षण के प्रयास और कानूनी स्थिति: भारत में इस लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए गए हैं:
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: भारत सरकार ने इन्हें इस अधिनियम के तहत सूचीबद्ध कर कानूनी सुरक्षा प्रदान की है।
- भारत का पहला अभयारण्य: तमिलनाडु सरकार ने 2021 में करूर-डिंडीगुल सीमा पर कडावुर-अय्यलुर क्षेत्र में भारत का पहला ‘स्लेंडर लोरिस अभयारण्य’ स्थापित किया, जो 11,806 एकड़ में फैला है।


