हंपबैक्स डॉल्फिन

“द हंपबैक्स ऑफ गोवा” लघु फिल्म दक्षिन फाउंडेशन द्वारा निर्मित है, जिसे रफर्ड फाउंडेशन और IISc (प्रधानमंत्री अनुसंधान फैलोशिप) द्वारा वित्तपोषित किया गया है। यह मुख्य रूप से गोवा के डॉल्फिन-वाचिंग (पर्यटन) उद्योग पर केंद्रित है।

डॉल्फिन ‘सिटासिया’ (Cetacea) गण से संबंधित हैं, जिसमें व्हेल और पोरपोइज़ भी शामिल हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. मिस्टिसेट्स (Mysticetes): ये ‘बेलीन व्हेल’ (जैसे ब्लू व्हेल) होती हैं। इनके पास दांतों के बजाय केराटिन की प्लेटें (Baleen) होती हैं, जो समुद्री जल से प्लवक (Plankton) को छानकर खाने में मदद करती हैं।
  2. ओडोन्टोसेट्स (Odontocetes): ये दांतों वाले स्तनधारी जीव हैं। इसमें छोटी डॉल्फिन से लेकर किलर व्हेल और पायलट व्हेल तक शामिल हैं।

भारत में हंपबैक डॉल्फिन: भारत सिटासियन की लगभग 30 प्रजातियों का घर है। दुनिया में हंपबैक डॉल्फिन की चार मान्यता प्राप्त प्रजातियों में से दो भारत में पाई जाती हैं:

  • हिंद महासागर हंपबैक डॉल्फिन: भारत के पश्चिमी तट (जैसे गोवा) पर पाई जाती है।
  • इंडो-पैसिफिक हंपबैक डॉल्फिन: भारत के पूर्वी तट पर पाई जाती है।
  • महत्वपूर्ण तथ्य: हंपबैक डॉल्फिन अनिवार्य रूप से तटीय प्रजातियां हैं। ये आमतौर पर तट से केवल 2 से 4 किलोमीटर के दायरे में ही रहती हैं और उससे आगे गहरे समुद्र में कम ही जाती हैं।

डॉल्फिन का व्यवहार और जीव विज्ञान

  • प्रजनन: डॉल्फिन पानी के नीचे जन्म देती हैं और प्रसव के दौरान अपनी सांस रोककर रखती हैं।
  • सामाजिक संरचना: मनुष्यों की तरह, वे ‘फिशन-फ्यूजन’ (fission-fusion) समूहों में रहती हैं। इसका अर्थ है कि उनके समूह का आकार और सदस्य समय के साथ बदलते रहते हैं—कभी वे बड़े समूह में मिल जाते हैं, तो कभी छोटे समूहों में बंट जाते हैं।
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