कुरुंबा पेंटिंग

कुरुंबा पेंटिंग एक प्रागैतिहासिक कला रूप है, जिसके 3000 साल से भी अधिक पुराने होने का अनुमान है। रिपोर्टों के अनुसार, नीलगिरी में निवास संरचनाओं पर कुरुंबा चित्रों का सबसे पुराना प्रलेखित प्रमाण 1871-1872 की अवधि का है। पारंपरिक रूप से यह कला नीलगिरी की ऊँची पहाड़ियों में चट्टानों और गुफाओं पर बनाई जाती थी।

इसके रंग जंगलों से प्राप्त होते हैं। वेंगाई (Vengai) पेड़ के तने के अर्क का उपयोग पीला, भूरा और बैंगनी रंग बनाने के लिए किया जाता है, पचईकीड़ा (Pachaikeeda) की पत्तियों को कुचलकर हरा रंग प्राप्त किया जाता है, लाल रेत से मिट्टी के रंग (earthy tones) मिलते हैं, और करीमरम (Karimaram) पेड़ का उपयोग काला रंग बनाने के लिए किया जाता है।

जनजातीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को डर है कि तत्काल सहायता के बिना यह कला रूप लुप्त हो सकता है। हाल ही में, अलु कुरुंबा (Alu Kurumba) समुदाय के कृष्णन राघवन को पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

अलु कुरुंबा

अलु कुरुंबा जनजाति कुरुंबा का ही एक उपसमूह है। कुरुंबाओं को भारत में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

नीलगिरी जिला तमिलनाडु में पहचाने गए सभी छह PVTG समुदायों का घर है। कुरुंबा जनजाति मुख्य रूप से तमिलनाडु और केरल की नीलगिरी पहाड़ियों में निवास करती है।


महत्वपूर्ण तथ्य

विशेषताविवरण
कला का नामकुरुंबा पेंटिंग (प्रागैतिहासिक रॉक आर्ट)
स्थाननीलगिरी पहाड़ियाँ (तमिलनाडु और केरल)
प्राकृतिक रंगवेंगाई पेड़ (पीला/बैंगनी), पचईकीड़ा पत्तियां (हरा), करीमरम (काला)
जनजाति की श्रेणीPVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group)
हालिया सम्मानकृष्णन राघवन को पद्म श्री (कला के क्षेत्र में)

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