उन्नत IVF तकनीक से 5 साहीवाल बछड़ों का जन्म हुआ

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), बरेली ने टेस्ट-ट्यूब भ्रूण स्थानांतरण (embryo transfer) के माध्यम से एक बछिया सहित पाँच स्वस्थ बछड़ों का सफलतापूर्वक प्रजनन कराया है। यह विकास एक वैज्ञानिक मील का पत्थर है, जिसमें पहली बार अल्ट्रासाउंड-निर्देशित ओवम पिक-अप, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन और भ्रूण स्थानांतरण (OPU–IVF–ET) तकनीक के माध्यम से स्वदेशी साहीवाल बछड़ों का जन्म हुआ है।

विशेष रूप से, ये सभी बछड़े एक ही साहीवाल डोनर गाय के अंडों से पैदा हुए हैं। अपनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता के लिए प्रसिद्ध, साहीवाल मवेशी भारतीय उपमहाद्वीप की एक लोकप्रिय स्वदेशी डेयरी नस्ल है, जो मुख्य रूप से पंजाब (भारत और पाकिस्तान) में पाई जाती है।

OPU–IVF–ET तकनीक

  • तकनीक: यह प्रक्रिया ओवम पिक-अप (OPU) और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) का उपयोग करके की गई थी।
  • समय सीमा: अंडा एकत्र करने से लेकर भ्रूण स्थानांतरण और जन्म तक की पूरी प्रक्रिया लगभग नौ महीने की सामान्य गर्भावस्था अवधि के भीतर पूरी हुई।
  • विधि: इस प्रक्रिया में, अल्ट्रासाउंड-आधारित तकनीकों का उपयोग करके जानवरों से परिपक्व अंडे एकत्र किए जाते हैं और लैब में शुक्राणु के साथ निषेचित (fertilise) किए जाते हैं। इन भ्रूणों को भविष्य में उपयोग के लिए संग्रहीत भी किया जा सकता है।
  • प्रत्यारोपण: इन लैब-विकसित भ्रूणों को फिर सरोगेट गायों या भैंसों (अक्सर कम दूध देने वाली) के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है, जिससे बेहतर आनुवंशिक गुणों को व्यापक रूप से फैलाने में मदद मिलती है।

लाभ और भविष्य की योजनाएं: वैज्ञानिकों का कहना है कि ये “टेस्ट-ट्यूब” संतानें मूल पशु के समान ही दूध उत्पादन करने की क्षमता रखती हैं, जिससे नस्लों में सुधार और कुल दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। OPU–IVF तकनीक की दक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ सामान्य प्रजनन में गाय या भैंस साल में केवल एक बार गर्भवती हो सकती है, वहीं इस तकनीक से एक भैंस से सालाना लगभग 10 और एक गाय से लगभग 20 बछड़े प्राप्त किए जा सकते हैं।


अन्य महत्वपूर्ण नस्लें: इस शोध कार्यक्रम (जो 2022-23 में शुरू हुआ) का उद्देश्य अन्य प्रमुख नस्लों की आनुवंशिक गुणवत्ता में भी सुधार करना है:

  • थारपारकर गाय: अच्छे दूध उत्पादन के लिए जानी जाने वाली यह द्वि-प्रयोजनीय नस्ल है (दूध और खेती दोनों के लिए)। यह राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र की मूल निवासी है।
  • मुराह भैंस: यह भारत की सबसे लोकप्रिय और उच्च उपज देने वाली भैंस की नस्लों में से एक है, जो अपने उच्च दुग्ध उत्पादन और वसा (fat) की मात्रा के लिए जानी जाती है। यह मुख्य रूप से हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती है।

  • GS पेपर III: जैव प्रौद्योगिकी, कृषि
  • प्रारंभिक परीक्षा: पशुओं की नस्लें, सहायक प्रजनन तकनीकें
  • मुख्य परीक्षा: पशुधन उत्पादकता बढ़ाने में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका
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