पुष्कर झील से साइनोबैक्टीरिया ‘पुष्करनाइमा क्यूराजे’ की खोज
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central University of Rajasthan) के शोधकर्ताओं ने अजमेर की पुष्कर झील से साइनोबैक्टीरिया (cyanobacteria) की एक नई प्रजाति की पहचान की है।
पुष्करनाइमा क्यूराजे (Pushkarnema CURAJAE) नाम का यह जीव 2016 और 2021 के दौरान पुष्कर सरोवर के क्षेत्रीय दौरों में एकत्र किए गए नमूनों में पाया गया था। इसका वंश (Genus) नाम ‘पुष्कर’ और प्रजाति (Species) नाम ‘CURAJAE’ क्रमशः पुष्कर झील और राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय को समर्पित हैं।
नवनिर्मित साइनोबैक्टीरियम का उपयोग संभावित रूप से दवाएं, जैव उर्वरक (biofertilisers) और यहां तक कि पोषक तत्वों से भरपूर पूरक विकसित करने के लिए किया जा सकता है जो प्रतिरक्षा (immunity) और समग्र स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।
साइनोबैक्टीरिया क्या हैं?
साइनोबैक्टीरिया जलीय और प्रकाश संश्लेषक (photosynthetic) होते हैं, यानी वे पानी में रहते हैं और अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। चूंकि वे बैक्टीरिया हैं, इसलिए वे काफी छोटे और आमतौर पर एककोशिकीय (unicellular) होते हैं, हालांकि वे अक्सर इतने बड़े समूहों (colonies) में बढ़ते हैं जिन्हें देखा जा सकता है। उनके नाम एक विशेष उपलब्धि है—वे 3.5 अरब साल से भी अधिक पुराने, ज्ञात सबसे प्राचीन जीवाश्मों में शामिल हैं! यह जानकर आपको आश्चर्य हो सकता है कि साइनोबैक्टीरिया आज भी मौजूद हैं; वे पृथ्वी पर बैक्टीरिया के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण समूहों में से एक हैं।
ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व
- तेल भंडार: कई प्रोटेरोज़ोइक (Proterozoic) तेल भंडार साइनोबैक्टीरिया की गतिविधि के कारण माने जाते हैं।
- कृषि: वे चावल और बीन्स की खेती में नाइट्रोजन उर्वरक के महत्वपूर्ण प्रदाता हैं।
- विकासक्रम: साइनोबैक्टीरिया ने पृथ्वी के इतिहास में विकास और पारिस्थितिक परिवर्तन की धारा को आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिस ऑक्सीजन युक्त वातावरण पर हम निर्भर हैं, वह आर्कियन और प्रोटेरोज़ोइक युग के दौरान अनगिनत साइनोबैक्टीरिया द्वारा उत्पन्न किया गया था।
- पौधों की उत्पत्ति: साइनोबैक्टीरिया का दूसरा बड़ा योगदान पौधों की उत्पत्ति है। क्लोरोप्लास्ट (chloroplast), जिसकी मदद से पौधे अपना भोजन बनाते हैं, वास्तव में पौधे की कोशिकाओं के भीतर रहने वाला एक साइनोबैक्टीरियम ही है।
प्रकाश संश्लेषक और जलीय होने के कारण, साइनोबैक्टीरिया को अक्सर “नील-हरित शैवाल” (blue-green algae) भी कहा जाता है।


