GSI ने कालिंजर किले के पास स्थित ‘एपार्चियन अनकन्फर्मिटी’ को राष्ट्रीय जियो हेरिटेज साइट घोषित किया
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने 6 मार्च, 2026 को अपने 176वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में कालिंजर किले के पास स्थित ‘एपार्चियन अनकन्फर्मिटी’ (Eparchaean Unconformity) को राष्ट्रीय महत्व के ‘भू-विरासत स्थल’ (Geo-heritage Site) के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता दी है।
यह स्थल क्यों महत्वपूर्ण है?
यह स्थल पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास में लगभग 80 करोड़ (800 मिलियन) वर्षों के एक बड़े समय अंतराल (gap) को दर्शाता है। यहाँ दो अलग-अलग युगों की चट्टानें एक-दूसरे के ऊपर स्थित हैं:
- नीचे की परत: लगभग 2.5 अरब वर्ष पुराना ‘बुंदेलखंड ग्रेनाइट’ (आर्कियन युग)।
- ऊपर की परत: लगभग 1.2 अरब वर्ष पुराना ‘कैमूर बलुआ पत्थर’ (विंध्यन सुपरग्रुप, प्रोटेरोज़ोइक युग)।
इन दोनों परतों के बीच का समय अंतराल वह समय है जिसका कोई भौतिक रिकॉर्ड इन चट्टानों में मौजूद नहीं है, जिसे भूविज्ञान की भाषा में ‘अनकन्फर्मिटी’ कहा जाता है।
ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व
विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्राकृतिक चट्टानी संरचनाओं ने प्राचीन शासकों को रणनीतिक सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिन्होंने यहाँ अभेद्य कालिंजर किले का निर्माण किया। यह स्थल न केवल विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की सैन्य वास्तुकला के इतिहास से भी जुड़ा है।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था
कालिंजर को खजुराहो के मंदिरों (यूनेस्को विश्व विरासत स्थल) और चित्रकूट जैसे नजदीकी पर्यटन स्थलों के साथ एकीकृत करके बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे न केवल पर्यटन सर्किट मजबूत होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी।
क्या आप जानते हैं? ‘एपार्चियन अनकन्फर्मिटी’ का एक अन्य प्रसिद्ध उदाहरण आंध्र प्रदेश के तिरुमला पहाड़ियों (पूर्वी घाट) में भी देखने को मिलता है, जहाँ प्राचीन प्रीकैम्ब्रियन चट्टानें और उनके ऊपर की युवा संरचनाएं एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती हैं।


