असम से अगरवुड चिप्स का पहला कानूनी निर्यात

असम ने अपनी कृषि-वन अर्थव्यवस्था (agro-forest economy) में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। राज्य ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को अगरवुड चिप्स (agarwood chips) का पहला कानूनी रूप से स्वीकृत निर्यात किया है। इसने अत्यधिक वैश्विक मांग और मजबूत राजस्व क्षमता वाले इस उद्योग के लिए एक नया अध्याय खोल दिया है।

इस खेप (consignment) में सऊदी अरब के लिए 100 किलोग्राम और यूएई के लिए 12 किलोग्राम अगरवुड चिप्स शामिल थे, जिन्हें 13 मई 2026 को लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (गुवाहाटी) के कार्गो टर्मिनल से रवाना किया गया। इस खेप का कुल मूल्य ₹2.35 करोड़ था।

क्या है अगरवुड (Agarwood)?

अगरवुड को ऊद (Oud), गहारू (Gaharu) या अगर (Agar) के नाम से भी जाना जाता है। यह दुनिया की सबसे मूल्यवान सुगंधित कच्ची सामग्रियों में से एक है। खाड़ी देशों (Gulf), यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में लग्जरी परफ्यूम (इत्र), धूप/अगरबत्ती, सौंदर्य प्रसाधनों और पारंपरिक उत्पादों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। असम में उगने वाले अगरवुड को इसकी बेहतर गुणवत्ता, समृद्ध सुगंध और उच्च तेल सामग्री के लिए बहुत पसंद किया जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में राज्य को एक मजबूत बढ़त देता है।

ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और औषधीय महत्व

  • धार्मिक महत्व: अगरवुड को दुनिया की सबसे मूल्यवान धूप/सुगंध के रूप में सराहा जाता है। हजारों वर्षों से इसका उपयोग हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म सहित विभिन्न धार्मिक परंपराओं में किया जाता रहा है।
  • पारिवारिक और साहित्यिक संदर्भ: इत्र बनाने के अलावा, पारंपरिक चिकित्सा में भी अगरवुड का महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों, जिनमें चरक संहिता भी शामिल है, में इसके चिकित्सीय गुणों के संदर्भ मिलते हैं। इसका उल्लेख 5वीं शताब्दी ईस्वी में कालिदास की कविताओं में भी मिलता है।
  • पारंपरिक चिकित्सा: यह पारंपरिक चीनी चिकित्सा (Traditional Chinese Medicine) और यूनानी चिकित्सा पद्धति का भी एक प्रमुख घटक है।

यह सुगंधित लकड़ी कैसे बनती है? (वैज्ञानिक प्रक्रिया)

यह सुगंधित धूप ‘थाइमेलेसी’ (Thymelaeaceae) परिवार के एक्विलाएरिया (Aquilaria) और गाइरिनोप्स (Gyrinops) वंश से संबंधित पेड़ों द्वारा उत्पादित रालदार सामग्री (resinous material) से प्राप्त होती है।

यह राल (resin) पेड़ द्वारा एक रक्षा प्रणाली (defence mechanism) के रूप में तब पैदा की जाती है, जब पेड़ ‘फियोएक्रेमोनियम’ (Phaeoacremonium species – Phialophora parasitica) नामक एक विशेष फंगस (उल्ली/मोल्ड) के संक्रमण के कारण अत्यधिक तनाव से गुजरते हैं। इसके अलावा, मवेशियों द्वारा चराने या पेड़ों को होने वाली किसी चोट/घाव के कारण भी यह प्रक्रिया शुरू होती है। इन पेड़ों में से केवल एक छोटा सा हिस्सा, जिसका अनुमान दो से सात प्रतिशत है, इत्र बनाने के लिए अगरवुड का उत्पादन कर पाता है।

भारत में उपलब्धता

भारत में मुख्य रूप से एक्विलाएरिया मैलाकेंसिस (Aquilaria malaccensis) और एक्विलाएरिया खासियाना (Aquilaria khasiana) प्रजातियां पाई जाती हैं। ये पूर्वोत्तर के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती हैं, विशेष रूप से असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर में।एक दिलचस्प तथ्य: त्रिपुरा की राजधानी ‘अगरतला’ का नाम भी इन्हीं अगरवुड के पेड़ों (Agar trees) से लिया गया है, जो अतीत में यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे।

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