मानसून की प्रगति धीमी क्यों हुई: ये हैं पांच कारण

दक्षिण-पश्चिम मानसून, जिसने 4 जून को केरल में थोड़ी देरी से दस्तक दी थी, ने गति पकड़ी और 15 जून तक अधिकांश दक्षिणी, पूर्वी और पूर्वोत्तर  भारत को कवर कर लिया। लेकिन उसके बाद से इसकी प्रगति धीमी हो गई है।

जून से सितंबर तक चलने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की वार्षिक वर्षा का 70% से अधिक हिस्सा लाता है। जलवायु विज्ञान के अनुसार, मानसून मई के तीसरे सप्ताह में अंडमान सागर में पहुंचता है और आम तौर पर 1 जून तक केरल के रास्ते मुख्य भूमि में प्रवेश करता है। इसके बाद यह महोर्मि (surges) के रूप में आगे बढ़ता है और जून के अंत तक उत्तरी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उसके पड़ोसी इलाकों में पहुंच जाता है, तथा 15 जुलाई तक पूरे देश को कवर कर लेता है। हालांकि, मानसून की जल्दी या समय पर शुरुआत अच्छे मानसून या उसके बेहतर वितरण की गारंटी नहीं देती है।

मानसून की प्रगति धीमी होने के प्रमुख कारण

मानसून की बारिश को दबाने/कम करने वाले सभी पांचों प्रमुख कारक एक ही समय में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, जिससे यह चिंता बढ़ गई है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 अभी एक और सप्ताह के लिए भारत के कुछ हिस्सों में कमजोर या थमा रह सकता है।

मौसम विश्लेषकों का कहना है कि इसके लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार है:

  • भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल नीनो (El Niño) स्थितियों का विकसित होना। एल नीनो मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का समय-समय पर गर्म होना है, जो आमतौर पर भारतीय मॉनसून को कमजोर करता है।
  • कमजोर मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) गतिविधि (भूमध्य सागर से उत्पन्न होने वाली पूर्व की ओर बढ़ने वाली पवन और बादलों की एक पट्टी)।
  • उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में चलने वाली शुष्क पछुआ पवनें (dry westerly winds)।
  • कमजोर सोमाली जेट (निचले स्तर की हवा की एक धारा जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारत की ओर धकेलने में मदद करती है)।
  • बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले क्षेत्रों (low-pressure systems) का न होना।
  • हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole: IOD) का न्यूट्रल (तटस्थ) होना।

आईओडी (IOD) की भूमिका: एक पॉजिटिव (सकारात्मक) IOD, जब पश्चिमी हिंद महासागर पूर्वी हिस्से की तुलना में अधिक गर्म होता है, तो वह मानसून की बारिश में मदद कर सकता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, वर्तमान में IOD न्यूट्रल है और इसके आगे भी ऐसे ही बने रहने की संभावना है।

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