सिक्किम में दुर्लभ ‘मिश्मी टाकिन’ का पहला वीडियो फुटेज रिकॉर्ड किया गया

उत्तरी सिक्किम के तिंगदा आरक्षित वन (Tingda Reserve Forest) में बेहद दुर्लभ और शर्मीले मिश्मी टाकिन (Mishmi Takin) के एक झुंड का पहला वीडियो फुटेज रिकॉर्ड किया गया है। राज्य में पिछले दो दशकों से भी अधिक समय में इस संकटापन्न  प्रजाति की उपस्थिति की पुष्टि करने वाले सबसे महत्वपूर्ण दृश्यों में से एक है।

वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, यह दुर्लभ दृश्य आरक्षित वन के बाकुचेन (Bakuchen) क्षेत्र में एक नियमित गश्त के दौरान देखा गया, जहाँ अधिकारियों ने आठ मिश्मी टाकिन के एक झुंड रिकॉर्ड किया।

बकरी और एंटीलोप जैसा दिखने वाला एक अनोखा जीव

मिश्मी टाकिन हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले कम जाने-माने बड़े स्तनधारियों में से एक है। हालांकि यह देखने में बकरी और एंटीलोप (मृग) के मिश्रण जैसा लग सकता है, लेकिन यह जीव ‘गोट-एंटीलोप’ (बकरी-मृग) के एक अनूठे समूह से ताल्लुक रखता है और अपनी असामान्य शारीरिक बनावट के लिए जाना जाता है।

 पूर्वी हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों की यह  मूल प्रजाति एक बड़ा खुरदार (Ungulate) जीव है। देश के पूर्वोत्तर छोर पर स्थित दिबांग घाटी की खड़ी चोटियों और घने जंगलों वाली धुंध से घिरी मिश्मी पहाड़ियों (Mishmi Hills) के नाम पर इसका नाम रखा गया है। मिश्मी टाकिन का चेहरा बेहद आकर्षक और अलग होता है: एक काली और उभरी हुई नाक, एक भारी व गठीला शरीर, अंदर की ओर तेजी से मुड़े हुए सींग और लंबे, घने बालों वाला फर।

संरक्षण की स्थिति और सुरक्षा का स्तर

विज्ञान की भाषा में ‘बुडोर्कास टैक्सिकलर टैक्सिकलर’ (Budorcas taxicolor taxicolor) के नाम से जाने जाने वाले इस पर्वतीय जीव को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा ‘वल्नरेबल’ (Vulnerable) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है—जो इसकी घटती आबादी का संकेत है। भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत इसे अनुसूची I (Schedule I) में रखा गया है, जिसमें उन प्रजातियों को शामिल किया जाता है जिन्हें सबसे उच्च स्तर की सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

पर्यावास और प्राकृतिक अनुकूलन

टाकिन 4,500 मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित पथरीले व दुर्गम रास्तों, घने जंगलों वाली घाटियों से लेकर अल्पाइन घास के मैदानों (Alpine Meadows) में रहते हैं। उनकी त्वचा से एक प्राकृतिक तैलीय (ओइली) पदार्थ निकलता है जो उन्हें बारिश और अत्यधिक ठंडे मौसम की मार से बचाने में मदद करता है। यह प्रजाति भारत के अरुणाचल प्रदेश के अलावा चीन और म्यांमार में भी पाई जाती है।

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