पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर भारत में निकेल धातु का संकट

पश्चिम एशिया (मध्य-पूर्व) में चल रहे युद्ध के कारण भारत के इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरी, ऊर्जा भंडारण सेवाएं और स्टेनलेस स्टील क्षेत्र निकेल (nickel) की बढ़ती कीमतों और इसके डेरिवेटिव्स की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि इंडोनेशिया में इस चमकीली-सफेद धातु को परिष्कृत (refine) करने वाले संयंत्रों को युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी के कारण पश्चिम एशिया से फास्फोरस और सल्फर की आपूर्ति में कमी का सामना करना पड़ रहा है।

 निकेल, भारत के स्वच्छ ऊर्जा ट्रांजीशन और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत अपनी फेरोनिकल ( निकेल और लोहे का मिश्रण) की लगभग 80% आवश्यकता इंडोनेशिया से आयात करता है। फेरोनिकेल और  निकेल पिग आयरन (NPI), जो लोहे और निकल के मिश्र धातु हैं, स्टेनलेस स्टील बनाने के लिए प्राथमिक कच्चा माल हैं। इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरी की लागत में  निकेल का योगदान लगभग 22% है। 

इंडोनेशिया विश्व में  निकेल का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसके पास 21 मिलियन टन (Mt) का भंडार है, जो वैश्विक भंडार कुल का 20.6% है।  निकेल पृथ्वी की भूपर्पटी (क्रस्ट) में पांचवां सबसे आम तत्व है।  निकेल अपनी मूल अवस्था में नहीं पाया जाता है। शुद्ध निकल को इसके ऑक्साइड के अपचयन (reduction) या मॉन्ड प्रक्रिया (Mond process) द्वारा प्राप्त किया जाता है। भारत में  निकेल का उत्पादन प्राथमिक स्रोतों से नहीं होता है और इसकी पूरी मांग आयात के माध्यम से पूरी की जाती है।

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