CBI ने  AI -आधारित हेल्पबॉट ‘अभय’ लॉन्च किया

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने ‘अभय’ (ABHAY – AI-Based Helpbot for Authentication of CBI notices) लॉन्च किया है। यह अपनी तरह का पहला रियल-टाइम (तत्काल) नोटिस सत्यापन सिस्टम है, जिसे नागरिकों को बढ़ती साइबर धोखाधड़ी और ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटालों के खतरे से बचाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। नागरिक सीबीआई की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से किसी भी समय ‘अभय’ (ABHAY) का उपयोग कर सकते हैं।

यह चैटबॉट नागरिकों को प्राप्त हुए नोटिस की प्रामाणिकता के बारे में जानकारी देगा और यह स्पष्ट करेगा कि नोटिस असली (genuine) है या संभावित रूप से फर्जी (fraudulent) है। नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे धोखाधड़ी वाली योजनाओं, विशेष रूप से “डिजिटल अरेस्ट” की रणनीति वाले घोटालों के प्रति सतर्क रहें।

साइबर अपराध की चुनौतियाँ और ‘डिजिटल अरेस्ट’ का सच

साइबर धोखाधड़ी भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक जैसी तकनीकों के तेजी से बढ़ते विकास ने आम नागरिकों के लिए असली और नकली के बीच अंतर करना बेहद मुश्किल कर दिया है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले की कार्यप्रणाली (Modus Operandi): यह साइबर धोखाधड़ी का एक बेहद शातिराना रूप है, जो पीड़ित के मन में अत्यधिक डर पैदा करके काम करता है।

  • फर्जी नोटिस: इसकी शुरुआत एक ऐसे फर्जी नोटिस से होती है जो किसी वैध कानून प्रवर्तन एजेंसी (जैसे पुलिस या सीबीआई) द्वारा जारी किया गया प्रतीत होता है।
  • झूठे आरोप: इस नोटिस में पीड़ित पर किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का झूठा आरोप लगाया जाता है।
  • छद्म कानूनी प्रक्रिया: एक बार जब पीड़ित डरकर उनकी बात मान लेता है, तो जालसाज एक नकली कानूनी प्रक्रिया शुरू करते हैं। वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बहाने पीड़ित को कई दिनों तक (वीडियो कॉल आदि के जरिए) अपनी निगरानी में रखते हैं।
  • महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य: ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) जैसी किसी अवधारणा का भारतीय कानून में कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है। कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी इस तरह से किसी को डिजिटल रूप से गिरफ्तार या नजरबंद नहीं करती हैं।
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