सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य में अवैध रेत खनन को “पर्यावरणीय संकट” करार दिया
सर्वोच्च न्यायालय ने 17 अप्रैल (2026) को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध रेत खनन को “पर्यावरणीय संकट” (Environmental Crisis) करार दिया है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि यह घड़ियाल संरक्षण परियोजना के लिए एक गंभीर खतरा है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों को इस गतिविधि पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए कड़ी फटकार लगाई।
न्यायालय के कड़े निर्देश:
- निगरानी: अवैध खनन के लिए उपयोग किए जाने वाले रास्तों पर हाई-रिज़ॉल्यूशन और वाई-फाई सक्षम CCTV कैमरे लगाने का निर्देश दिया गया है।
- निरीक्षण: इन कैमरों की लाइव फीड सीधे संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षक (SP) या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) की देखरेख में होगी।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के बारे में:
यह 5,400 वर्ग किमी में फैला त्रि-राज्य (Tri-state) अभयारण्य है, जो चंबल नदी के किनारे राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है।
- स्थापना: इसे सबसे पहले 1978 में मध्य प्रदेश में एक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था और 1979 में इसे ‘राष्ट्रीय अभयारण्य’ का दर्जा मिला।
- भौगोलिक विशेषता: चंबल नदी विंध्य श्रेणियों (M.P.) से निकलती है और उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में यमुना नदी में मिलने से पहले तीनों राज्यों से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र बीहड़ों (Ravines) और पहाड़ियों के चक्रव्यूह के लिए प्रसिद्ध है।
- प्रमुख लुप्तप्राय प्रजातियां:
- घड़ियाल (Gharial): लंबी थूथन वाला मगरमच्छ, जिसके लिए यह अभयारण्य मुख्य सुरक्षित पर्यावास है।
- गंगा नदी डॉल्फिन: मीठे पानी की दुर्लभ डॉल्फिन।
- रेड-क्राउंड रूफ टर्टल: अत्यंत लुप्तप्राय कछुआ।
- अन्य जीव: मगर (Muggar), ऊदबिलाव (Otter) और जलीय व स्थलीय पक्षियों की विस्तृत विविधता।
यह अभयारण्य देश के कुछ सबसे लुप्तप्राय वन्यजीवों के लिए “अंतिम गढ़” माना जाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नदी के किनारों पर स्थित रेत की क्यारियाँ (Sandy beaches) इन जीवों के प्रजनन और अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं, जिन्हें अवैध खनन पूरी तरह नष्ट कर रहा है।


