भारत में मिनरल वाटर का रेगुलेशन

खनिज जल (Mineral Water) वह जल है जिसमें प्राकृतिक रूप से घुले हुए खनिज और सूक्ष्म तत्व (trace elements) मौजूद होते हैं। इस विषय का हिंदी अनुवाद और मुख्य मानक नीचे दिए गए हैं:

स्रोत: यह स्प्रिंग (झरना) या एक्विफर (भूजल स्तर) जैसे संरक्षित भूमिगत जलाशयों से आता है।

प्राकृतिक प्रक्रिया: खनिज जल उन प्राकृतिक खनिजों को बनाए रखता है जो इसने वर्षों, दशकों या सदियों की भूगर्भीय प्रक्रियाओं के दौरान प्राप्त किए हैं।

सामान्य खनिज: इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटेशियम, बाइकार्बोनेट, सल्फेट, क्लोराइड, सिलिका और कभी-कभी सूक्ष्म मात्रा में फ्लोराइड या आयरन शामिल होते हैं।


भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने प्राकृतिक खनिज जल के लिए कड़े नियम निर्धारित किए हैं:

भूमिगत स्रोत: पानी प्राकृतिक झरनों या बोरवेल जैसे भूमिगत स्रोतों से आना चाहिए।

संरक्षण: यह विभिन्न भूगर्भीय संरचनाओं द्वारा संरक्षित होना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पानी प्रदूषण से मुक्त है।

स्थिरता (IS 13428): BIS मानक IS 13428 के अनुसार, पानी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थ (TDS) और विभिन्न खनिजों का अनुपात समय के साथ और अलग-अलग बैचों में स्थिर होना चाहिए।

प्रसंस्करण पर प्रतिबंध: उत्पादकों को खनिज संरचना बदलने के लिए पानी को उपचारित करने की अनुमति नहीं है। वे केवल इसे फ़िल्टर करने, छानने (decant), हवा देने (aerate) और कीटाणुरहित (sterilise) करने के लिए अधिकृत हैं।

रसायन निषेध: क्लोरीन मिलाने जैसी रासायनिक विसंक्रमण (chemical decontamination) प्रक्रियाओं की अनुमति नहीं है।

Source: The Hindu

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