भारत-कनाडा यूरेनियम समझौता महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत और कनाडा ने $2.6 बिलियन (लगभग ₹21,600 करोड़) के एक ऐतिहासिक यूरेनियम आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत कनाडाई कंपनी कैमेको (Cameco), वर्ष 2027 से 2035 के बीच भारत को 2.2 करोड़ पाउंड (लगभग 10,000 टन) यूरेनियम की आपूर्ति करेगी।

समझौते के मुख्य बिंदु और भारत की आवश्यकता:

  • आयात पर निर्भरता: भारत अपनी परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए 70% से अधिक यूरेनियम आयात पर निर्भर है। वर्तमान में भारत प्रति वर्ष 1,500 से 2,000 टन यूरेनियम की खपत करता है।
  • घरेलू बनाम विदेशी अयस्क: भारत में यूरेनियम की उपलब्धता तो है, लेकिन इसकी गुणवत्ता कम (0.02% से 0.45%) है, जबकि कनाडा की कुछ खदानों में यह 15% तक उच्च गुणवत्ता वाला है। इस कारण घरेलू यूरेनियम का उत्पादन आयातित ईंधन की तुलना में काफी महंगा पड़ता है।
  • रणनीतिक महत्व: घरेलू उत्पादन महंगा होने के बावजूद भारत के परमाणु हथियार कार्यक्रम और आपूर्ति में किसी भी बाधा (Supply Disruption) से बचने के लिए अनिवार्य है।
  • लक्ष्य 2047: भारत सरकार का लक्ष्य 2047 तक परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता को वर्तमान 9GW से बढ़ाकर 100GW करना है। भविष्य में भी घरेलू ईंधन कुल मांग का केवल 30% ही पूरा कर पाएगा।

भारत के यूरेनियम स्रोत और भंडार:

वर्तमान में भारत कम से कम चार देशों से यूरेनियम प्राप्त कर रहा है:

  1. कजाकिस्तान
  2. उज्बेकिस्तान
  3. रूस (कुडनकुलम रिएक्टरों के लिए आजीवन आपूर्ति का वादा)
  4. कनाडा (नया समझौता)

भारत में घरेलू भंडार

भारत में यूरेनियम का भंडार मुख्य रूप से झारखंड और आंध्र प्रदेश (7 सक्रिय खदानें) में केंद्रित है। इसके अलावा मेघालय, राजस्थान और तेलंगाना में भी भंडार मौजूद हैं। अनुमान के अनुसार, भारतीय भंडारों में लगभग 4.3 लाख टन यूरेनियम अयस्क है।

Source: IE

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