सिग्मा (σ) चक्र मॉडल पर नया अनुसंधान

दशकों से जीव विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में यह पढ़ाया जाता रहा है कि बैक्टीरिया में जीन ट्रांसक्रिप्शन (प्रक्रिया जिसके द्वारा DNA से RNA बनता है) एक चक्र के रूप में होता है।

पुराना मॉडल (The Traditional Model)

  • प्रक्रिया: सिग्मा (σ) कारक नामक प्रोटीन RNA पॉलीमरेज़ से जुड़ता है ताकि ट्रांसक्रिप्शन शुरू हो सके।
  • धारणा: यह माना जाता था कि एक बार प्रक्रिया शुरू होने के बाद, सिग्मा कारक अलग (detach) हो जाता है ताकि प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
  • आधार: यह मॉडल मुख्य रूप से Escherichia coli (E. coli) बैक्टीरिया के अध्ययन पर आधारित था।

नई खोज (The New Findings)

बोस संस्थान (कोलकाता) और रटगर्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह “सिग्मा चक्र” सभी बैक्टीरिया पर लागू नहीं होता:

  • Bacillus subtilis का उदाहरण: इस बैक्टीरिया में, मुख्य कारक σA पूरी ट्रांसक्रिप्शन प्रक्रिया के दौरान RNA पॉलीमरेज़ से जुड़ा रहता है। वह शुरुआत के बाद अलग नहीं होता।
  • संशोधित E. coli: शोध में यह भी देखा गया कि यदि E. coli के σ70 कारक में बदलाव किया जाए, तो वह भी प्रक्रिया के अंत तक जुड़ा रहता है।

इस शोध का महत्व

यह खोज केवल शैक्षणिक बदलाव तक सीमित नहीं है, इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं:

  1. पाठ्यपुस्तकों का पुनरीक्षण: पिछले 50 वर्षों से चली आ रही “यूनिवर्सल” अवधारणा अब बदल जाएगी।
  2. बैक्टीरियल जेनेटिक्स की समझ: यह शोध बताता है कि विभिन्न बैक्टीरिया में जीन नियंत्रण की प्रक्रियाएं हमारी सोच से कहीं अधिक जटिल और विविध हैं।
  3. एंटीबायोटिक विकास: चूंकि ट्रांसक्रिप्शन बैक्टीरिया के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए इस प्रक्रिया की सटीक समझ भविष्य में नई एंटीबायोटिक दवाओं को विकसित करने में मदद कर सकती है।
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