लॉगरहेड कछुए और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
जर्नल ‘एनिमल्स’ (Animals) में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, मजबूत जबड़े वाले लॉगरहेड कछुए (loggerhead turtles) जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का सामना कर रहे हैं। जैसे-जैसे महासागर गर्म हो रहे हैं और समुद्री उत्पाद कम हो रहे हैं, ये कछुए साल में पहले ही घोंसले बना रहे हैं, और अधिक चिंताजनक बात यह है कि वे कम अंडे और कम अंतराल पर अंडे दे रहे हैं।
लॉगरहेड कछुए का नाम इसके असाधारण रूप से बड़े सिर के कारण रखा गया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण इन सर्वाहारी समुद्री सरीसृपों (reptiles) पर कम से कम चार तरह से प्रभाव पड़ा है।
सरीसृप का यह अध्ययन 17 वर्षों तक चला, और यह पश्चिम अफ्रीका के तट पर स्थित एक द्वीप देश काबो वर्डे (Cabo Verde) में आयोजित किया गया था, जहाँ हर साल हजारों मादा लॉगरहेड कछुए अंडे देती हैं। हालाँकि कछुए के व्यवहार में ये नई घटनाएँ “अनुकूलन” (adaptive) हो सकती हैं, लेकिन वैज्ञानिकों को डर है कि यह प्रजाति के लिए दीर्घकालिक परिणामों का संकेत दे सकती हैं।
मादा लॉगरहेड ने अब कम अंतराल पर प्रजनन करना शुरू कर दिया है: पहले जो अंतराल हर दो साल में होता था, वह आज चार साल का हो गया है। लेखकों ने यह भी देखा कि प्रत्येक घोंसले में कम अंडे थे, और कछुओं का आकार भी छोटा होता जा रहा है।
लॉगरहेड कछुए का नाम इसके बड़े सिर के लिए रखा गया है, जो शक्तिशाली जबड़े की मांसपेशियों को सहारा देता है जिससे वे कठोर खोल वाले शिकार, जैसे कि व्हील्क्स (whelks) और शंख (conch) को खा सकते हैं। लॉगरहेड पूरी दुनिया में पाए जाते हैं और लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम (ESA) के तहत इनकी नौ अलग-अलग जनसंख्या श्रेणियां (DPS) सूचीबद्ध हैं।


