महाद्वीपीय मेंटल भूकंप
स्टैनफोर्ड के शोधकर्ताओं ने एक दुर्लभ प्रकार के भूकंप का पहला वैश्विक मानचित्र तैयार किया है, जो पृथ्वी की भूपर्पटी (crust) में नहीं, बल्कि ग्रह के मेंटल (mantle) की गहराई में आते हैं। मेंटल वह परत है जो पतली भूपर्पटी और पृथ्वी के पिघले हुए कोर (core) के बीच स्थित होती है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष:
- क्षेत्रीय क्लस्टर: ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, महाद्वीपीय मेंटल भूकंप (Continental mantle earthquakes) दुनिया भर में होते हैं, लेकिन ये कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित हैं। विशेष रूप से हिमालय (दक्षिण एशिया) और एशिया व उत्तरी अमेरिका के बीच बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait) में इनकी अधिकता देखी गई है।
- गहराई: सामान्य भूकंप पृथ्वी की ठंडी और भंगुर पपड़ी में लगभग 10 से 29 किलोमीटर की गहराई पर उत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत, मेंटल भूकंप बहुत गहरे होते हैं, जो कभी-कभी पपड़ी और मेंटल की सीमा से 80 किमी से भी अधिक नीचे आते हैं।
चौंकाने वाले तथ्य:
- मोहो (Moho) सीमा: पपड़ी और मेंटल को अलग करने वाली इस सीमा को ‘मोहोरोविकिक डिस्कंटिन्यूटी’ (Mohorovičić discontinuity) कहा जाता है। इसके नीचे का मेंटल गर्म और अर्ध-ठोस होता है।
- भंगुर-तन्य संक्रमण (Brittle-ductile transition): वैज्ञानिकों के लिए यह आश्चर्यजनक है क्योंकि आमतौर पर बढ़ती गर्मी और दबाव के कारण गहराई में चट्टानें टूटने (fracture) के बजाय बहने (flow) लगती हैं। इस संक्रमण बिंदु के बाद चट्टानें चटकना बंद कर देती हैं और रेंगना (creeping) शुरू कर देती हैं, जिससे वहां भूकंप की संभावना कम मानी जाती थी।
- महत्व: हालांकि मेंटल भूकंप सतह पर गंभीर झटके पैदा करने के लिए बहुत गहरे होते हैं, लेकिन इनका अध्ययन करने से भूकंप के यांत्रिकी (mechanics) की व्यापक समझ बेहतर हो सकती है।


