वैली ऑफ द किंग्स

मिस्र की ‘वैली ऑफ द किंग्स’ में शोधकर्ताओं ने थीबन नेक्रोपोलिस (Theban Necropolis) के छह मकबरों में तमिल-ब्राह्मी, संस्कृत और प्राकृत के लगभग 30 शिलालेखों को प्रलेखित किया है।

तमिल-ब्राह्मी शिलालेख और ‘कोट्टन’ का रहस्य:

  • तमिल-ब्राह्मी शिलालेख में ‘चिकै कोट्टन’ (Cikai Koṟṟaṉ) नाम का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका पहला भाग संस्कृत के ‘शिखा’ (śikhā) शब्द से जुड़ा हो सकता है, जिसका अर्थ ‘शिखा’ या ‘मुकुट’ होता है।
  • ‘कोट्टन’ (Koṟṟaṉ) नाम पहले भी सामने आ चुका है। यह लाल सागर के बंदरगाह ‘बेरेनिक’ (Berenike) से मिले एक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर अंकित “कोट्टपुमान” में भी दिखाई देता है।
  • संगम साहित्य में भी इसके प्रमाण मिलते हैं, जहाँ चेर राजा ‘पित्तान्कोट्टन’ को सीधे ‘कोट्टन’ कहकर संबोधित किया गया है। ये समानताएं मिस्र में मिले इन भित्तिलेखों (graffiti) को प्राचीन तमिल भूमि या ‘तमिलगम’ के साहित्यिक और पुरालेखीय रिकॉर्ड से मजबूती से जोड़ती हैं।

विविधता और क्षेत्रीय विस्तार:

  • प्रलेखित किए गए लगभग 30 शिलालेखों में से लगभग 20 तमिल-ब्राह्मी में हैं।
  • शेष 10 शिलालेख संस्कृत, प्राकृत और गांधारी-खरोष्ठी में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी भारत (गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों) से भी लोग वहां मौजूद थे।
  • एक संस्कृत शिलालेख ‘क्षहरात’ (Kshaharata) राजा के एक दूत (envoy) का उल्लेख करता है जो “यहाँ आया था”। यह एक महत्वपूर्ण विवरण है क्योंकि क्षहरात राजवंश ने पहली शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया था।

ऐतिहासिक निष्कर्ष: तमिल-ब्राह्मी, संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों की उपस्थिति कहानी को और आगे ले जाती है। ये शिलालेख बताते हैं कि भारतीय व्यापारी केवल बंदरगाह पर रुकने, सामान बदलने और चले जाने तक सीमित नहीं थे। वे वहां इतने समय तक रुके कि उन्होंने यात्रा की, दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया और स्थानीय स्मारकीय प्रथाओं में भी भाग लिया।

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