मैंग्रोव क्लैम (Geloina erosa)

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) ने नियंत्रित परिस्थितियों (captive conditions) में मैंग्रोव क्लैम (Geloina erosa) का सफलतापूर्वक कृत्रिम प्रजनन (induced breeding) कराया है।

यह उपलब्धि समुद्री संरक्षण और तटीय आजीविका की दिशा में एक बड़ा कदम है।

मैंग्रोव क्लैम (Mangrove Clam) के बारे में:

  • स्थानीय नाम: इसे उत्तरी केरल में लोकप्रिय रूप से “कंदल कक्का” (Kandal Kakka) के नाम से जाना जाता है। इन्हें ‘मड क्लैम’ भी कहते हैं।
  • पर्यावास: ये क्लैम दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के मैंग्रोव और ज्वारनदमुख (estuarine) पारिस्थितिकी तंत्र में पाए जाते हैं। ये विशेष रूप से मैंग्रोव क्षेत्रों के कार्बनिक-समृद्ध कीचड़ वाले सबस्ट्रेट्स में रहते हैं।
  • विशेषता: यह दुनिया के सबसे बड़े मड क्लैम में से एक है, जिसकी खोल (shell) की चौड़ाई 10 सेमी तक हो सकती है।

पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व:

  • पारिस्थितिकी तंत्र: ये पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण (nutrient recycling), तलछट को स्थिर करने और मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • खाद्य सुरक्षा: यह भारत के कई हिस्सों, विशेषकर केरल में, एक मूल्यवान स्थानीय व्यंजन है और तटीय समुदायों की आजीविका का आधार है।

कृत्रिम प्रजनन की आवश्यकता क्यों?

भारत के पूर्वी तट और द्वीप क्षेत्रों में इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। इसके मुख्य कारण हैं:

  1. अंधाधुंध कटाई (Indiscriminate harvesting)
  2. आवास का विनाश (Habitat degradation)
  3. प्रदूषण और तटीय विकास

सफलता का प्रभाव:

हैचरी में उत्पादित बीजों (seeds) के माध्यम से अब खेती (Farming) की जा सकेगी। इससे:

  • प्राकृतिक स्टॉक को फिर से बहाल करने में मदद मिलेगी।
  • जंगली आबादी पर दबाव कम होगा।
  • तटीय परिवारों के लिए आय के स्थिर अवसर पैदा होंगे।
error: Content is protected !!